कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 516, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें५०८ | कंब रामायण
अब मेरे साथ है। दूसरी सेना के आने की अवधि भी कल ही है। वह सेना भी आ जाय, तो तब आगे के कर्त्तव्य के बारे में विचार करना उचित होगा।—यो सुग्रीव ने कहा।
प्रेम-भरे रामचन्द्र ने कहा—हे वीर ! तुम्हारे लिए यह (सेना-संगठन) कोई कठिन कार्य नहीं हैं। तुम्हारी विनम्रता भी अच्छी है। फिर, आगे कहा—अब दिन का अधिक भाग बीत गया है। अब तुम जाओ, अपनी सेना के आने के पश्चात् आओ—यो प्रभु के आदेश देने पर उन्हे प्रणाम करके सुग्रीव विदा हुआ।
अरुण कमलदल-सदृश नेत्रवाले (रामचन्द्र) ने अंगद के प्रति मधुर वचन कहकर यो आदेश दिया कि हे तात ! तुम भी जाकर अपने पिता (सुग्रीव) के साथ विश्राम करो। फिर, अपने भाई तथा अपने ध्यान में स्थित (सीता) देवी के साथ स्वय भी उस रात को वही विश्राम करते रहे।
अति महान् कीर्त्तिवाले ने (अपने अनुज के प्रति) आदेश किया कि सुग्रीव के पास तुम्हारे जाने तथा वहाँ घटित अन्य सभी घटनाओं का वृत्तांत सुनाओ। तब सबको सत्य रूप में समझने की शक्ति रखनेवाले पराक्रमी लक्ष्मण ने (सारा वृत्तांत) कह सुनाया। (१-१३६)
अध्याय ११
सेना-संदर्शन पटल
उस दिन रात को वे (रामचन्द्र) वही ठहरे। प्राची दिशा के स्वर्णमय उन्नत गिरि पर सूर्य का प्रकाश फैलने के पहले ही किस प्रकार, बलवान् वानर-दूतों के द्वारा लाई गई पर्वत-समान सेना वहाँ आ पहुँची—अब यह हम उसका वर्णन करेंगे।
शतबली नामक वानर-वीर, दस लाख गजो के बल से युक्त एक सहस्र वानर-सेनापतियों को तथा सुचारु रूप से दलों मे विभाजित, शंख-समान उज्ज्वल, अति मनोहर दस सहस्र कोटि संख्यावाली वानर-सेना को साथ लेकर आ पहुँचा।
सुषेण नामक उत्तम वानर-वीर, मेरु पर्वत को उखाड़नेवाली, सचेत होकर मदिरा का पान करने से स्वच्छ मनवाली शत सहस्र कोटि वानर-सेना को साथ लेकर आ पहुँचा।
अमृत-सदृश बोलीवाली रूमा का पिता, अड़तालीस सहस्र कोटि वानर-सेना को लेकर आ पहुँचा, जो अपार समुद्र को भी क्षणमात्र में कीचड़ बना सकती थी।
इस धरती तथा ऊपर के लोको मे भी अपनी कीर्त्तिको सुस्थिर बनानेवाले उत्तम (हनुमान्) को जन्म देनेवाला केसरी (नामक वानर-वीर) पचास लाख कोटि, उन्नत पर्वत-सदृश कंधोवाले वानरों की सेना को लेकर ऐसे आ पहुँचा, मानो कोई समुद्र ही आ गया हो।
क्रोध करने पर एक-एक वानर सूर्य को भी प्रतापहीन कर देने तथा अपने बल का