कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 514, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें५०६ | कम्ब रामायण
आदि लाकर सन्नद्ध करूँगा, तो तुम्हारे मित्र (राम) भोजन कर सकेंगे, इसलिए अब एक क्षण भी मेरा यहाँ बिलम्ब करना उचित नहीं है—यों लक्ष्मण ने कहा। वानरपति ने यह कहकर कि जब वह मनुकुलाधिप दुःख में डूबा है, तब मैं सुखी जीवन व्यतीत कर रहा हूँ—यह कर्म वानर-जाति में उत्पन्न हम-जैसे लोग ही कर सकते हैं, व्याकुल होकर अत्यन्त दुःखी हुआ। सूर्यपुत्र तब झट उठा, अश्रु बहाता हुआ, ऐश्वर्यमय जीवन से विरक्त होकर, अत्यंत दुःखी तथा व्याकुल चित्त के साथ, उत्तम (राम) के निकट जाने की इच्छा में हनुमान् को देखकर कहने लगा— हे नीति-निपुण ! गये हुए दूतों के द्वारा जो सेना लाई जायगी, उसको तुम अपने साथ ले आना। उस समय तक तुम यहीं रहो।—यों हनुमान् को आदेश देकर शीघ्र प्रभु के आवास के लिए चल पड़ा। अरुण किरणोंवाले (सूर्य) का पुत्र आशंका से मुक्त चित्तवाले (लक्ष्मण) का आलिंगन करके शीघ्रता से अपने भाई (राम) के आवास की ओर चल पड़ा। उसके साथ अंगद भी चला। वानर वीर आगे-आगे जा रहे थे। वानर-रमणियो का मन उनके पीछे- पीछे जा रहा था। मार्ग पीछे-पीछे छूट रहा था। नौ सहस्त्र कोटि वानर उसके आगे और पीछे और दोनों ओर जा रहे थे। अति उत्तम बन्धुजन समीप में चल रहे थे। बिजली के समान उज्ज्वल आभरण धारण किये हुए सुग्रीव यो जा रहा था। उस समय— ध्वजाओ के समुदाय सर्वत्र भर गये। बजनेवाले नगाड़ो की ध्वनि सर्वत्र भर गई। शंख सर्वत्र बज उठे। चमकनेवाले आभरणो की कांति-रूपी विद्युत्-पुंज सर्वत्र भर गये। (धरती से) धूल उठने लगी और आकाश में सर्वत्र छा गई। स्वर्ण, मुक्ता, मनोहर एव महीन वस्त्रो, उज्ज्वल रत्नो, स्फटिक-खंडो तथा रजत- खडो से निर्मित शिविकाएं समीप में आ रही थी; श्वेत छत्र आकाश में ऊँचे उठे मनोरथ ढंग से आ रहे थे। रामचन्द्र के अनुज के उज्ज्वल अरुण चरण धरती पर चलने से, सूर्य-पुत्र भी, अपने चरणों के वीर-वलयो को शब्द्रित करता हुआ, अपनी पालकी के पीछे-पीछे (पैदल ही) पत्नी-रूपी रथ पर जा रहा था। वीर-लक्षण तथा मनोहर धनुष धारण करनेवाले लक्ष्मण तथा सुग्रीव, इतनी शीघ्रता से चलकर रामचन्द्र के आवास-पर्वत पर पहुँचे कि वानरों की सेना पीछे रह गई; अंगद भी उनके पार्श्व से पीछे रह गया। किन्तु, उनका (रामचन्द्र के प्रति) प्रेम आगे-आगे जा रहा था। गुणहीन अपार मर्यादा की आशंका त्यागकर प्रभु के चरणों की सेवा करने के लिए भक्ति-सरित् आगम सुग्रीव निष्कम्प धर्म-स्वरूप (राम) के चरणों की निकट ऐसा बैठा, मानो, दोनों भुवन की समता करता था। अपने केशों, चमर के रेशों, लाये (अक्षत, पुष्प) के ...