कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 513, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ५०५
परिपूर्ण चन्द्रमा के समान शोभित था तथा उस उदयाचल पर उदित होनेवाले अपने पिता (अर्थात्, सूर्य) के समान प्रकाशमान था ।
वीर लक्ष्मण ने अपने सम्मुख कपिकुल के राजा को प्रकट होते देखा । तब उनका क्रोध भड़क उठा । किन्तु, उन्होंने धर्म की व्यवस्था का विचार करते हुए अपने क्रोध को निर्मल विवेक से शात कर लिया ।
उन दोनो ने लौह-स्तम्भो तथा पर्वतो से भी भारी भुजाओ से परस्पर आलिंगन किया । फिर, वानर-स्त्रियो तथा वानर-वीरो के समुदाय के साथ स्वर्ण-निर्मित सौध के भीतर जा पहुँचे ।
कपिकुलाधिप ने पहले से तैयार किये हुए एक उत्तम आसन को दिखाकर (लक्ष्मण से) कहा—हे वीर ! इसपर आसीन होओ । तब (लक्ष्मण) मन मे सोचने लगे कि जब लक्ष्मी के नायक (राम) तृणमय पृथ्वी पर विश्राम करते हैं, तब ऐसे आसन पर बैठना मेरे लिए उचित नहीं है ।
फिर (सुग्रीव से) कहा—पत्थर-जैसे (कठोर) मनवाली कैकेयी के लिए उज्ज्वल रत्न-किरीट को त्यागकर वन में आये हुए मेरे स्वामी (राम) जब तृण-शय्या पर सोते हैं, तब क्या स्वर्ण-विनिर्मित, पुष्पांलंकृत मृदुल आसन पर बैठना मेरे लिए उचित है ?
लक्ष्मण के यों कहने पर सूर्यपुत्र अपने कमल-सदृश नयनो मे आँसू भरकर खड़ा रहा । तब मनु के वंश में उत्पन्न उत्तम क्षत्रियकुमार (लक्ष्मण) पर्वत-जैसे ऊँचे उठे हुए उस प्रासाद की फर्श पर बैठ गये ।
युवक, वृद्ध, असंख्य स्त्रियाँ—सब उस समय अश्रुमय नयनों और मलिन दृष्टि के साथ, कुछ कह न सकने के कारण मौन रहे । मन की व्यथा से विह्वल हो रहे और पंचेन्द्रियो का दमन करनेवाले मुनियो के समान स्थित रहे ।
महाराज (सुग्रीव) ने (लक्ष्मण से) कहा—आप यथाविधि स्नान करके मधुर भोजन करें, तो हम सब कृतार्थ हो जायेगे । उसके यह कहने पर अंजनवर्ण (राम) के अनुज कहने लगे—
दुःख और अपवाद हमारे पेट को भर रहे हैं । इसीसे हम जीवित हैं, तो अब हमे मधुर लगनेवाला अन्य पदार्थ क्या चाहिए ? अत्यन्त बुभुक्षा के होने पर भी, यदि दुःख के कारण मन फिरा हुआ रहता है, तो अमृत भी तो कडुवा ही लगता है ।
प्रभु की देवी का अन्वेषण करके उनका पता लगा दोगे, तो तुम मानों हमारे अपयश-रूपी अग्नि को बुझाकर हमे गंगाजल में स्नान करानेवाले होओगे । समुद्र मे उत्पन्न अमृत पिलानेवाले होओगे और हमे अन्य कोई दुःख नही रह जायगा ।
पत्ते, कंद, शाक-फल आदि प्रभु के आहार करने के पश्चात् शेष का आहार मैं करता हूँ । वही मेरा भोजन है । उससे अन्य कुछ मै नही खा सकता । यदि वैसा कुछ खाना चाहूँ, तो वह कुत्ते के जूठन के बराबर होगा । इसमे सन्देह नहीं ।
हे राजन् ! इतना ही नही, एक बात और सुनो। यहाँ से जाकर मैं शाक-कंद