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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 512
५०४कंब रामायण

से मैं बचा। अन्यथा उग्र गति से आनेवाले वीर के क्रोध से मेरी मृत्यु होने में क्या संदेह था ?

हे तात ! इस मद्यपान¹ से उत्पन्न होनेवाले दुष्परिणाम से मैं भीत हो रहा हूँ। उसका कर से स्पर्श ही नहीं, मन से स्मरण करना भी अच्छा नहीं है। यदि मैं फिर, कभी उस (मद्य) की इच्छा करूँ, तो वीर (राम) के रक्त कमल-समान चरण मुझे विनष्ट कर दें—इस प्रकार सुग्रीव ने कहा।

फिर, अनेक सद्गुणों से पूर्ण (सुग्रीव) ने उपयुक्त प्रकार से कहकर अंगद को यह आज्ञा देकर प्रेषित किया कि तुम लक्ष्मण के स्वागतार्थ आवश्यक सामग्री लेकर स्वयं उनके समीप जाओ। वह स्वयं भी अपनी सहधर्मिणी पत्नियों तथा परिवार के व्यक्तियों के साथ विशाल सौध-द्वार पर जा पहुँचा।

(लक्ष्मण के आगमन के समय) चंदन-लेप, पुष्प, सुगंधित चूर्ण, (अगुरु आदि) का सुरभित धूम, पंक्तियों में रखे हुए स्वर्ण-कलश, दीपों की आवलियाँ, श्रेणियों में लटकने-वाले मुक्ताहार, वितानों में हिलनेवाले मयूरपंख, ध्वजाएँ, ऊँची ध्वनि करनेवाले शंख तथा मृदंग—ये सब वीथियों में भरे थे।

वह किष्किन्धानगर इस प्रकार शोभायमान हो रहा था कि उसकी शुद्ध, दृढ़ स्फटिकमय भित्तियों के मध्यभाग में तथा चारों ओर उत्तम रत्नों के बने स्तंभों के मध्यभाग में (लक्ष्मण की) परछाईं पड़ने से दर्शकों के मन में संदेह होता था कि क्या सहस्रों वीर हाथ में धनुष लिये आ रहे हैं।

अंगद उस समय समीप आकर (लक्ष्मण के) चरणों पर प्रणत हुआ। तब लक्ष्मण ने उससे पूछा—हे तात ! तुम्हारे महाराज कहाँ हैं ? अंगद ने उत्तर दिया—हे वीर केसरी ! वे पुण्यवान् आपका स्वागत करने के लिए मेघस्पर्शी सौध-द्वार पर खड़े हैं।

चूड़ियों और कंकणों से भूषित करोंवाली वानर-रमणियाँ सुगंधित चूर्ण और वस्त्रों को उछाल रही थीं और विशाल चामरों को हिला-हिलाकर हवा कर रही थीं। श्वेत छत्र ऐसा सुशोभित हो रहा था, जैसा पूर्ण उज्ज्वल चन्द्रमा आसमान में चमक रहा हो—इस प्रकार कपिकुलराज, सुन्दर धनुष को धारण करनेवाले पराक्रमी वीर (लक्ष्मण) के सम्मुख आया।

पलाश-पुष्प-समान अधरोंवाली रमणियाँ अर्घ्य इत्यादि के लिए उपयुक्त सामग्री लिये आ रही थीं। नगाड़े मेघों के समान गरज रहे थे। ऋषिगण वेद-पाठ कर रहे थे। संगीत-नाद सब दिशाओं में फैल रहा था। इस प्रकार सुग्रीव आ रहा था, तो उसके नवीन वैभव को देखकर देवता लोग भी विस्मय में पड़ गये।

महिमावान् (लक्ष्मण) का स्वागत करने के लिए श्रीयुक्त सुग्रीव आ पहुँचा। (उसके साथ आनेवाली) स्पृहणीय स्तनोंवाली वानर-स्त्रियाँ नक्षत्रों के समान चमक रही थीं और सुग्रीव स्वयं उदयाचल पर उदित होकर आकाश में दृष्टिगत होनेवाले, कलाओं से


१. मद्यपान-संबंधी ऊपर के कुछ पद्य प्रक्षिप्त-से लगते हैं।—अनु०