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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 549 में से

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पृष्ठ 511

किष्किन्धाकाण्ड ५०३

हनुमान् से जाकर कहा। अब शीघ्र ही आप जाकर (लक्ष्मण से) मिलें—यही कर्त्तव्य है।

(राम-लक्ष्मण के प्रति) स्नेह से पूर्ण मनवाले (सुग्रीव) ने कहा—हे कुमार! उन्होंने मेरा जैसा उपकार किया है, क्या वह अन्य किसी के द्वारा संभव है? मुझे जो संपत्ति प्राप्त हुई है, क्या उसका कोई अंत भी है? उन्होंने (रामचन्द्र ने) मुझसे अपने जिन कष्टों को दूर करने की आशा की थी, उन्हें मैं मदिरा के नशे में पड़कर भूल गया। अब मैं उन्हें (लक्ष्मण को) देखने के लिए लज्जित हो रहा हूँ।

मुझसे जो कार्य हुआ है, इससे बढ़कर अज्ञान-भरा कार्य और क्या हो सकता है। (मद्य पीने से) यह पत्नी है, यह माता है—ऐसा विवेक भी जब नहीं रह जाता, तब अन्य धर्म के विषय में क्या कहना? यह (मद्य-पान) पंच महापापों में एक है। यही नहीं, हम तो पहले ही से माया में पड़े हुए हैं, उसपर मद्य के नशे में भी चूर हो जायें, तो फिर क्या कहना?

अविनश्वर ज्ञान से युक्त महात्माओं तथा वेदों ने कहा है कि जो माया-वशीभूत न होकर विवेक के साथ पापों से दूर रहते हैं, जन्म-मरण के दुःख से मुक्ति पायेंगे। पर, हम तो ऐसे हैं, जो मदिरा में पड़े हुए कीड़ों को निकालकर मद्य पी लेते हैं। हम ऐसे हैं, जैसे घर में लगी आग को घी डाल-डालकर बुझाने की चेष्टा करते हैं।

वेद-शास्त्र तथा अन्य सब यही कहते हैं कि यदि कोई अपना स्वरूप पहचान लेगा, तो उसका क्षुद्र जन्म मिट जायगा। हम तो पहले से ही, आत्म-स्वरूप को न पहचानने के कारण व्याधिपूर्ण गंदे शरीर को पाये हुए हैं। फिर, ऊपर से मद्य पीकर मति-भ्रष्ट भी हो जायें, तो क्या यह उचित होगा?

अभयदान देकर (शरणागत की) रक्षा करनेवाले, पंचेन्द्रियों पर नियंत्रण रखनेवाले, तत्त्वज्ञान (के समुद्र) में निमग्न रहनेवाले, सुख-दुःख के द्वन्द्व को मिटानेवाले ऐसे व्यक्तियों को छोड़कर क्या वे लोग सद्गति पा सकते हैं, जो दूसरों की आँख बचाकर मद्य पीते हैं और संसार के सम्मुख प्रकट रूप में हँसते-खेलते रहते हैं?

शत्रुओं के द्वारा कृत हानि को, मित्रों के द्वारा कृत उपकार को, अधीत विद्या को, प्रत्यक्ष देखे पदार्थों को, शास्त्रों के उपदेशों को, अपने को प्राप्त गौरव के कारण को, अपने को प्राप्त दुःख को—यदि कोई जान ले, तो इससे बढ़कर हितकारी ज्ञान उसके लिए और क्या हो सकता है?

मद्यपान करनेवाले में वंचना, चौर्य, असत्य, मोह, परंपरा के विरुद्ध विचार, शरणागत को छोड़ देने का स्वभाव, दंभ—ये सब (दुर्गुण) आकर निवास करते हैं। कमल-पुष्प में निवास करनेवाली लक्ष्मी उन्हें तजकर चली जाती है। विष तो केवल खानेवाले के प्राण हरण करता है, किंतु नरक में नहीं पहुँचाता—(मद्यपान नरक का निवास भी देता है)।

मैंने सुना था कि मदिरा-पान से हानि होती है, वह सुना हुआ वचन अब प्रत्यक्ष प्रमाणित हो गया। अब फिर कहने को क्या शेष रह गया है? हनुमान् की नय-निपुणता

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