कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 527, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ५१६
की ) सहधर्मिता सिद्ध नही हो सकेगी । दोनो छोरो पर झुके हुए दो मन्मथ चाप नहीं होते । अतः उसके भौंहो के उपमान भी कही नही हैं ।
शुक्लपक्ष की प्रथमा का चन्द्रमा, यदि उस सीता के ललाट की शोभा का अनेक दिनों तक ध्यान करता रहे और पूर्णिमा के दिन भी पूर्ण न होकर अर्द्ध ही बना रहे, तो उस सीता के ललाट की कुछ-कुछ समता कर सकेगा, जिसके चरणो की सुन्दरता मे दिन में प्रफुल्ल कमल-प्रभा भी लजा जाती है ।
हमारे अरण्य-वास मे आने के उपरान्त ( सीता के केशो को ) सजाने के लिए कोई ( दासी ) नही रही । ऐसा होने पर भी उन केशों की सुन्दरता घटी नही । कघी करने से नही, किन्तु स्वभाव से ही उसके केश घुंघराले हैं । नीलरत्न के समान वे अलक नित-नवीन रहते हैं । अतः, उनका कोई उपमान नही है ।
ब्रह्मदेव ने, काले मेघ के टुकड़े को, लाल कुमुद को झुके हुए धनुषों को, 'वल्ले' ( नामक लता ) के पत्तों को, उत्तम मीनों को, तथा उज्ज्वल मुक्ताओं को चन्द्रमा मे जोड़कर उसको सीता का वदन बना दिया । जब उस पुण्डरीक (-सदृश वदन ) के दर्शन तुम करोगे, तभी इस कथन को सच्चा मानोगे ।
अनेक सूक्ष्म केशो से भारी बना हुआ अति सुगन्धित उसका केशभार ऐसा है, मानो काले मेघ को काटकर उसपर मधु, अगरु-धूम आदि की सुगन्ध चढ़ा दी गई हो, फिर उसे घने अन्धकार के द्रव मे डुबो दिया गया हो और उसे ही घने तथा दीर्घ केश-पाश का नाम दिया गया हो ।
दिव्य कमल-पुष्प मे भी आवरण के दल लगे रहते हैं । सौदर्य की सीमा बना हुआ चन्द्र भी कलंक से युक्त है । इनके अतिरिक्त अन्य सभी उत्तम पदार्थों में कोई ऐसा नही है, जिसमें कुछ-न-कुछ दोष न हो । हसिनी-समान मनोहर गतिवाली सीता के अंग मे सब गुण-ही-गुण हैं । कही कुछ दोष नही है ।
हे तात ! विचार कर देखने पर ( विदित होता है कि ) उत्तम नारी के सभी लक्षण मनोहर तथा सुरभित कमल मे निवास करनेवाली लक्ष्मी में भी नही होते । किन्तु, कोकिल-सदृश मधुर बोली, मनोज्ञ मीन-सदृश नयनो, अरुण अधर तथा अप्सराओ को भी लज्जित कर देनेवाले स्तनो से युक्त उस ( सीता ) मे सभी लक्षण विद्यमान हैं ।
कमलासन ( ब्रह्मा ) ने बाँसुरी, वीणा, पिक, शुक, तोतली बोली आदि की सृष्टि करके अच्छी कुशलता प्राप्त करने के पश्चात् ही हार-युक्त स्तनोवाली ( सीता ) की मधुर-वाणी की सृष्टि की है । उस निर्दोष वाणी का कोई उपमान उस ब्रह्मदेव ने नही उत्पन्न किया है । क्या भविष्य मे कभी करेगा भी ?
स्वर्ग, भूमि और पाताल—तीनों भुवन अतिविशाल रूप मे फैले हैं । इनमे कही मीन-सदृश नयनवाली उस ( सीता ) की मधुरवाणी का उपमान कोई वस्तु नहीं है । यदि कह सकते हैं, तो एक मधु है और एक क्षीर है । तो भी वे दोनो श्रवण को मधुर नहीं लगते । एक दूसरा उपमान अमृत भी है, पर वह भी केवल रसना को स्वाद देनेवाला ही है, ( श्रवण-सुखद नही है ) ।