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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 549 में से

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पृष्ठ 526

५१० कंब रामायण

बनते हैं) उन (तोतों) के चञ्चु सीता के नखों के उपमान नही रह गये हैं, और उन (पलाश-पुष्पों) को फाड़ते रहते हैं। अब उन नखो के और क्या उपमान कहे ?

हे उत्तम ! (सीता के) अरुण कर एव अरुण चरण देखकर जिस प्रकार तुम्हें लाल कमल स्मरण आयेंगे, उसी प्रकार रक्त कुमुद-सदृश मदभरे दिव्य नयनोवाली उस (सीता) का कठ देखकर, यदि तुम्हें बढ़नेवाला क्रमुक-वृक्ष तथा जल मे उत्पन्न होनेवाला शंख स्मरण आवें, तो तुम उन्ही को उपमान मान लेना।

नील कुवलय के समान, काजल-लगे नयनोवाली सीता का मनोहर मुँह ऐसा है कि 'किडै' (नामक लाल सेवार), विंबफल, नवीन रक्तकुमुद, इन्द्रगोप, पलाश-पुष्प इत्यादि उपमान के योग्य पदार्थ भी, उस मुँह के सम्मुख श्वेत-से पड़ जाते हैं। ऐसे रक्त तथा अमृत-भरे उस मुख का उपमान वही मुख है।

रक्तवर्ण का अमृत नही होता। उस रंग का मधु भी नही होता। यदि वैसा अमृत और मधु कही होते भी हो, तथापि उनका पान करने पर ही वे मधुर लगते होगे। स्मरणमात्र से वे आनन्ददायक नही होगे। अतः, उज्ज्वल ललाटवाली सीता के प्रवाल-सम अधर के उपमान यदि हम अपने मन की पसंद के कोई पदार्थ बतावें, तो क्या वे उचित उपमान हो सकते हैं? (अर्थात्, नही हो सकते)।

हे अनुपम महिमावान् ! (सीता के) दंत कुंद मोर-पंखो के मूल, मुक्ता इत्यादि की समता करते हैं—यह कथन ऐसा ही है, जैसा यह कहना है कि उसकी वाणी अमृत, दुग्ध तथा मधु की समता करती है। वास्तव में, उन दाँतो के उपयुक्त उपमान कुछ नहीं हैं। यदि (देव) अमृत का कोई उपमान हो सकता है, तो उन (दाँतो) का भी उपमान हो सकता है।

हे अपार ज्ञानयुक्त ! गिरगिट (की नाक), तिल-पुष्प, रत्न-सहित कुभिल (नामक पुष्प) सीता की नासिका के उपमान हैं—यदि ऐसा कहे भी, तो वे सब उपमान, निखारे गये स्वर्ण तथा उज्ज्वल रत्न की समता नही करते (सीता की नासिका तो स्वर्ण एवं रत्न के समान भी है)। वह (नासिका) निपुण चित्रकार के लिए भी अंकित करने को दुस्साध्य हैं। तुम इसका विचार कर स्वयं समझ लो।

'वल्लै' लता के पत्र और कैंची—ये कानो के उपमान होते हैं?—यह बच्चो का कथन-मात्र है। यदि बड़े लोग भी इसी को दुहरायेंगे, तो वह उनका पागलपन होगा। तुम यह समझो कि शुक्रतारा के समान उज्ज्वल ताटंको ने जो तपस्या की थी, वह तपस्या (सीता के कानो को प्राप्त कर) सफल हुई। जो ससार की सब वस्तुओ के स्वय उपमान हैं, उनके उपमान कहाँ मिल सकते हैं?

(सीता के) करवाळ-सदृश दीर्घ नयनो के, जो देवाधिदेव (विष्णु) के समान काले हैं तथा श्वेत वर्ण से भी युक्त हैं, अति-विशाल समुद्र भी उपमान नहीं हो सकते। अहो ! यदि कोई दूसरा उपमान खोजना भी चाहें, तो वे नयन किसीके मन में ही नही समाते।

यदि करवाळ-सदृश नेत्रवाली सीता की भौंहो का वर्णन करने लगें, तो क्या उपमान दें? यदि ऐसा उपमान दें, जो पूर्ण रूप से उपमेय की समता न करें, तो वह अधम होगा। यदि किसी पदार्थ को सुन्दर मानकर उसे उपमान कहें, तो भी उससे (सीता की भौंहो