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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 525

किष्किन्धाकाण्ड ५१७

साधारण दृष्टि से यह कथन कि (सुन्दरियों के) उदर, वटपत्र, चित्र 'से अंकित सूक्ष्म चित्र-फलक, दुग्ध-सदृश मृदुल रजत-फलक, वर्तुलाकार दर्पण—ऐसे ही अन्य पदार्थों के समान होते हैं, अत्युक्तिपूर्ण कथनमात्र होता है। किंतु, सीता का उदर इतना सुन्दर है कि उन वस्तुओं के साथ उसकी उपमा देना भी उचित नहीं है।

हे समुद्र से भी अधिक विस्तृत ज्ञानवाले ! यदि (सीता देवी की) नाभि का उपमान निर्दोष 'कूदालि' (नामक पुष्प) तथा 'मंटि' (नामक पुष्प) को कहें, तो वे भी क्षुद्र ही होंगे। हाँ, मैं सोचता हूँ कि नदी की भँवर उसका उपमान हो सकती है। गंगा (की भँवर) को देखकर तुम यह बात समझ सकते हो।

लता-सदृश उस (देवी) के उदर पर जो रोमावली है, वह मेरे प्राणों की धारा ही है। यदि उसकी कोई उपमा देनी हो, तो उस अलान से दी जा सकती है, जिसपर दोषहीन कटि के तुल्य कोई छोटी लता स्थिर होकर लिपटी हो।

वह सीता, यह सोचकर कि कमल-दल पर रहने से उसके कोमल शरीर को कष्ट होता है, कमल का आसन छोड़कर धरती पर अवतीर्ण हुई है। उसके उदर पर स्वर्णवर्ण की त्रिवली ऐसी है, मानो मन्मथ ने तीनों भुवनों की सुन्दरियों की (सीता से) पराजय को सूचित करने के लिए ही तीन रेखाएँ अंकित कर दी हों।

उसके स्तनों के उपमान रत्न-संपुट (रत्न की डिबिया) कहूँ, स्वर्ण-कलश कहूँ, रक्तवर्ण कोमल नारिकेल कहूँ, प्रवाल को सान पर चढ़ाकर बनाई हुई चौसर की गोटी कहूँ, दिन में प्रकट हुए चक्रवाक कहूँ? क्या कहूँ? उसके स्तनों का कोई भी उचित उपमान मैने नहीं देखा है।

गन्ने को देखने पर या सुडौल बाँस को देखने पर, मेरी आँखों से अश्रु की वर्षा होने लगती है। इस प्रकार पीड़ा का अनुभव करने के अतिरिक्त, भ्रमरों से गुंजरित पुष्प-माला को धारण करनेवाली उस (सीता) की भुजाओं के उचित उपमान खोजने या कहने की दृढ़ता मुझमें नहीं है। अब और क्या कहूँ?

(सीता के) करों के सदृश कोई पदार्थ त्रिभुवन में नहीं है—ऐसा कहना भी अनुचित है। यदि कुछ उपमान कहने भी लगें, तो क्या 'कांदल' पुष्प को उनका उपमान कहें? वह तो (सीता के करों के सामने) अत्यन्त कठिन है। यदि मकरवीणा को उसका उपमान कहें, तो कुछ गुणों में समान होने पर भी अन्य गुणों में वह उसके अनुरूप नहीं है। जो स्वयं अत्यन्त सुन्दर है, उससे भी अधिक सुन्दर क्या वस्तु हो सकती है?

मनोहर अशोक-वृक्ष के पल्लव तो दूर रहे। कल्पवृक्ष के नवपल्लव या कनक-लता के कोमल दलवाले पुष्प भी उसकी हथेली के उपमान नहीं हो सकते। वे, सूत्र-सदृश सूक्ष्म कटिवाली उन सीता के नूपुरों से मुखर चरणों के भी उपमान जब नहीं बनते, तब उनकी हथेली के उपमान कैसे हो सकते हैं?

धवल दंत, अरुण अधर और चमकते आभरणों से युक्त, यौवनपूर्ण, मनोहर पुष्प-शाखा-सदृश उन सीता के नोकदार हस्त नखों के उपमान कहना असंभव है। तोते, पलाश-पुष्पों पर इसलिए क्रुद्ध रहते हैं कि उन्हीं के कारण (जो सीता के नखों के उपमान