कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें५२० कंब रामायण
हे उत्तम गुणवाले ! कमल-पुष्प में निवास करनेवाली मधुर बोलीवाली राजहंसिनी तथा मनोहर बालकरिणी ऐसी सुन्दर गतिवाली होती हैं कि उन्हें देखकर देवता भी विस्मय करते हैं। किन्तु, मुझे ( यह ) निश्चय नहीं होता है ( कि वे सीता के उपमान हो सकती हैं या नहीं )। हाँ, कविता करने में निपुण, प्राचीन कवि द्वारा विरचित सरस शब्द-गुम्फन से युक्त कविता की गति ही उस (सीता) की गति की समता कर सकती है।
( सीता की देह-कांति का क्या उपमान दें ? ) आम्रवृक्ष का कोमल पल्लव भी ( सीता के सम्मुख ) गाढ़ा दीख पड़ता है। सोने का रंग मंद पड़ जाता है। रत्नों की कांति-पूर्ण समता नहीं करती। विद्युत् की चमक (सीता से) लज्जित होकर छिप जाती है और बाहर नहीं निकलती। कमल का रंग पीछे रह जाता है। तो, अब अन्य कौन-सा रंग उपमान के योग्य है ? सीता की देह की कांति का उपमान उनकी देह ही है।
हे उत्तम गुणवाले ! उस (सीता) की समता करनेवाली स्त्री कोई भी नहीं है—केवल इस विचार को ही मन में दृढ रख लो और अपने चित्त से सीता को, उसके स्थान में पहचान लो, फिर उसके समीप जाकर ये अभिज्ञान-वचन कहो—यों कहकर (रामचन्द्र) आगे कहने लगे—
मैं पूर्व में (विश्वामित्र) मुनि के संग जल-संपन्न प्राचीन मिथिला नगरी में दीर्घकेशधारी जनक महाराज के यज्ञ को देखने के लिए गया था। तब उस परिखा के समीप, जिसमें हंस खेल रहे थे, कन्या-निवास के सौध में स्थित सीता को मैंने देखा। यह बात तुम उससे कहना।
अपार समुद्र से भी अधिक (विशाल तथा गभीर) पातिव्रत्य धर्म से युक्त सीता ने प्रतिज्ञा की थी कि पर्वत-समान धनुष को तोड़नेवाला व्यक्ति, यदि वह मुनि के संग आया हुआ राजकुमार (राम) न होगा, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। यह बात उसे सुनाना।
उस दिन, जनक महाराज की सभा में मैंने उस सीता को देखा। वह अपने मनोहर स्तन-रूपी गिरि-युगल का भार वहन करती हुई इस प्रकार आई, जिस प्रकार कोई मत्तगज, मुखपट्ट से आवृत परस्पर तुल्य दंतद्वय को लिये आ रहा हो। वह (स्तन-भार के कारण) गगन की विद्युल्लता के समान लचकती हुई आई थी।
तुम उस (सीता) से मेरे ये वचन कहना, जिन्हें मैंने उससे पहले कहा था—'हे मुग्धे ! तुम मेरे संग ऐसे भयंकर कानन में जाना चाहती हो, जिसे पहले तुमने देखा भी नहीं है। अबतक तुम मेरे लिए मुझे सुख देनेवाली रहीं। मेरे अपूर्व प्राणों के अनुकूल बनी रहीं। अब क्या तुम दुःख देनेवाली बनना चाहती हो ?'
तब सीता ने कहा—'हे अपने स्वत्व-राज्य-को भी त्यागकर वन में जानेवाले प्रभु ! क्या अब मेरे अतिरिक्त अन्य सब पदार्थ आपके लिए आनन्ददायक हो गये ?' और वह अपने मीन-सदृश तड़पते हुए विशाल कमल-दल की समता करनेवाले नयनों से अश्रु बहाती हुई, शरीर से निकलने के लिए तड़पते हुए अपने प्राणों के समान ही अत्यंत व्याकुल हो गई और मूर्च्छित होकर गिर पड़ी।—यह भी उससे कहना।
जब हम समृद्ध (अयोध्या) महानगर को छोड़कर चले थे, तब चन्द्र को छूनेवाली