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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 506

४६८ | कंब रामायण

शांत न होनेवाला क्रोध भी शांत हो गया। वे अपने सिर को झुकाकर उनकी ओर दृष्टि उठाने से भी संकोच करते हुए खड़े रहे।

लक्ष्मण, अपना कमल-वदन नीचा किये, अपने विशाल धनुष को धरती पर टेके, ऐसे खड़े रहे, जैसे अपनी साँसों के बीच खड़े हों। तब मनोहर कंधों, परिशुद्ध हृदय और दीर्घ नयनोंवाली तारा, उन वानर-रमणयों में से, जो धरती की अप्सराएँ जैसी थीं, पृथक होकर गद्गद स्वर में ये वचन कहने लगी—

हे वीर! हमारा यह बडा भाग्य है कि तुम हमारे इस घर में पधारे हो। अनंतकाल तक तप करने पर ही ऐसा भाग्य प्राप्त होता है, अन्यथा इन्द्र आदि के लिए भी ऐसा भाग्य दुर्लभ है। (तुम्हारे आगमन से) हम कर्मरहित हो उत्तम-गति प्राप्त कर चुकीं। इससे बढकर अन्य क्या सुकृत हो सकता है?

फिर, संगीत से भी मधुर बोलीवाली उस तारा ने प्रश्न किया—हे वीर! तुम उग्र रूप धारण करके यहाँ आये हो। तुम्हें देखकर वानर-सेना (तुम्हारे) आगमन का कारण न जानने से भयभीत हो रही है। तुम्हारा क्या उद्देश्य है? हे प्रभो! आज्ञा-रूपी चक्र को प्रवर्त्तित करनेवाले (चक्रवर्ती श्रीराम) के चरण-युगल को कभी न छोड़नेवाले तुम अब (उन्हें छोड़कर) किस कार्य से यहाँ आये हो?

पुष्पहार-भूषित वक्षवाले (लक्ष्मण) करुणा से आर्द्र हुए। उनका क्रोध कम हुआ। यह सोचते हुए कि कौन यह वचन कह रही है, उस तारा के मुख को, जो मानो दिन में धरती पर अवतीर्ण उज्ज्वल पूर्ण चन्द्र-जैसा था, निहारकर देखा। तब उसे देखकर उन्हें अपनी माताओं का स्मरण हो आया, जिससे वे व्याकुल हो उठे।

मंगल-सूत्ररहित, रत्नमय अन्य आभरणों से हीन, सुगंधित मधुपूर्ण पुष्पहार से आभूषित, कुंकुम, चंदन आदि के रस से अलिप्त, पीन एवं तापमय स्तनों तथा क्रमुकवृक्ष-सदृश अपने कंठ को (अपने आँचल से) ढके हुए उस नारीरत्न (तारा) को देखकर उदार स्वभाववाले वे (लक्ष्मण) अपने नयनों में अश्रु-भरे खड़े रहे।

उन (लक्ष्मण) के मन में यह विचार उठने से कि मेरी दोनों माताएँ (अर्थात्, कौशल्या और सुमित्रा) इसी वेश में रहती होंगी, वे शिथिलचित्त होकर दीर्घकाल तक वैसे ही खड़े रहे। फिर, यह सोचकर कि उनसे पूछे गये प्रश्नों का उन्हें कुछ उत्तर देना है, सुन्दर कुंतलोंवाली उस (तारा) को देखकर अपने उद्दिष्ट कार्य के बारे में यों कहने लगे—

सूर्यपुत्र सुग्रीव, मनुकुल के श्रेष्ठ नरेश (राम) के प्रति दिये अपने इस वचन को कि 'मैं अपनी सेना के साथ आपकी देवी का अन्वेषण कर उनका समाचार प्राप्त करूँगा' भूल गया है। मेरे अग्रज ने आदेश दिया है कि तुम शीघ्र जाकर उस सुग्रीव का हाल जानकर आओ। इसलिए मैं यहाँ आया हूँ। उसके उत्तम राज्य-शासन का हाल तुम बताओ—लक्ष्मण ने कहा।

हे प्रभु! क्रोध न करो। छोटे लोगों के अपराध को क्षमा करके तुम शांत हो जाओ। इस प्रकार क्षमा कर सकनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त और कौन हैं? वह अपने वचन