कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 505, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४९७
ढहकर सब दिशाओ मे दस योजन तक बिखर गये । तब वानर भय से विह्वल हो उठे ।
उस दृढ तथा उन्नत प्राचीर और उस विशाल नगर-द्वार के ढहकर गिरने से पत्थरों के प्रहार से शिर मे चोट खाये हुए वानर व्याकुल होकर दीर्घ दिशाओं मे भागकर अपने अपूर्व प्राणो को बचा पाये ।
अकथनीय घोर दुःख पाकर, अपना स्थान छोड़कर भागे हुए दोषहीन वे वानर, भयभीत होकर घोर शब्द करने लगे । उस ध्वनि से वह (किष्किन्धा) नगरी, उन्नत शिखरवाले मन्दर-पर्वत से मथे जानेवाले मीन-भरे तथा शब्दायमान समुद्र की समता करने लगी ।
अनेक वानर, भयभीत होकर, किष्किन्धा पर्वत से हटकर समीपवर्ती वनों में जा छिपे । उससे वह ऊँचा (किष्किन्धा) पर्वत, ऐसा लगने लगा जैसा नक्षत्रपूर्ण आकाश नक्षत्रहीन होने पर दीखता है ।
उस समय प्रतापी (रामचन्द्र) की आज्ञा-रूपी चक्र के जैसे लगनेवाले वे (लक्ष्मण) उस स्वर्णमय नगर की बीथियों म प्रविष्ट हो चलने लगे । तारा को घेरकर खड़े रहनेवाले (अंगद आदि) वानर कह उठे—अहो ! वे आ गये हैं । अब क्या करें ?
हे उत्तम कंकण धारण करनेवाली ! उन (लक्ष्मण) का हृदय पुष्प के समान कोमल है । यदि आप राजप्रासाद के द्वार पर जाकर उन्हें रोक दें, तो वह वीर, जो विचारवान् हैं, उस ओर आँख उठाकर भी नही देखेंगे । यही उत्तम उपाय है ।—यों हनुमान् ने कहा ।
तब तारा ने (उनसे) यह कहकर कि, तुम सब लोग जाओ । मै जाकर उन वीर (लक्ष्मण) के मन को शांत करूँगी—साहस के साथ पुष्पांकृत केशोंवाली अन्य सखियों-सहित चल पड़ी । इधर अन्य वानर उनसे हटकर दूर पर खड़े हो गये ।
कंठ में रस्सी (का आभरण) धारण किये हुए हाथी-जैसे लक्ष्मण, प्रसिद्ध वानरो के आनन्दपूर्ण आवास किष्किन्धा की राजवीथियों को पार कर विशाल राज-सौध में ज्यों ही प्रविष्ट होनेवाले थे, त्यों ही सहज सुगन्ध-भरित केशोंवाली तारा उनके मार्ग के मध्य उन्हें रोककर खड़ी हो गई ।
मनोज्ञ लावण्य, धवल चन्द्र-सदृश मन्दहास, सुन्दर कटि, उत्तम तथा नित्य यौवन-पूर्ण मृदु स्तन—इनसे युक्त उत्तम मयूर-तुल्य रमणियों के साथ वह तारा उस श्रेष्ठमार्ग को रोके खड़ी रही ।
रमणियों की सेना ने दृढता से (लक्ष्मण को) इस प्रकार घेर लिया कि (लक्ष्मण के) धनुष तथा करवाल उनके आभरणों में चमक उठे । उन (रमणियों) के मंजीर, जिनमें छोटे-छोटे कंकड़ भरे थे, बज उठे । मेखलाएँ भी बड़ा कोलाहल कर उठीं । सर्वत्र विविध भ्रू-लताएँ फैल गईं ।
शब्दायमान नूपुर नगाड़े बने थे । रमणियों के जघन बड़े रथ थे । परस्पर अनुरूप नयन-युगल बरछे थे । कठोर भौंहें युद्ध करनेवाले धनुष थीं । इस प्रकार, जब वे रमणियाँ घेरकर खड़ी हो गईं, तब स्वयं गौरव से भी गुरु होनेवाली भुजाओंवाले उन (लक्ष्मण) का