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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 500

४१२ | कंब रामायणं

वर्षा की बौछार भी थम गई। जैसे करवाळ कोशों मे बंद करके रख दिये गये हो, वैसे ही विद्युत् भी अदृश्य हो गई।

विशाल प्रान्तवाले ऊँचे पर्वत अपने सानुओ के निर्झरो से रहित हो गये। उनके केवल कुछ जल-स्रोत ही बहते रह गये। वे (पर्वत) ऐसे लगते थे, मानो वे यज्ञोपवीत और उत्तरीय के साथ श्वेत वस्त्र भी कटि मे धारण किये हों।

पर्वतो के ऊपर से मेघो के हट जाने से दिगंतों तक प्रवाहित होनेवाली नदियाँ जल-रहित हो गईं। अतः, वे (नदियाँ) सन्मार्ग पर न चलनेवाले उस व्यक्ति के समान थीं, जो उत्तम पुण्य के घट जाने पर निर्धन हो गया हो।

गड-स्थलों से मद-जल बहानेवाले हाथियो के समान स्थित काले मेघ गगन के प्रदेश को उन्मुक्त छोड़कर उड़े जा रहे थे। चन्द्रमा इस प्रकार चमक उठा, जिस प्रकार यवनिका के उठने पर विविध नाट्य-भंगियाँ दिखानेवाली नर्तकी का वदन हो।

उत्तरी पवन पुष्प-मकरन्द को बिखेरता हुआ इस प्रकार प्रवाहित हो उठा, जिससे स्वर्णमय आभरण धारण करनेवाली तरुणियो के विशाल तथा मनोज्ञ स्तनों पर अंकित चन्दन, कस्तूरी, कुंकुम आदि का लेप सूख गया।

हंस गगन मे सभी दिशाओ में मानो यह सोचकर उड़ रहेथे कि दशरथ चक्रवर्ती के कुमार (श्रीराम) के दुःख को दूर करने के लिए उचित समय अब आ गया है। अतः, हम भी (सीता) देवी का अन्वेषण करने चलें।

सरोवरों का जल छल-कपट से रहित तपस्वी जनो के मन के सदृश स्वच्छ हो गया। उन जलाशयो में विचरनेवाले मीन, 'रुई पर चलना है'—इस कथन को सुनने मात्र से जिनके कोमल चरण लाल हो जाते हो, ऐसी सुन्दर युवतियो के अञ्जन-लगे नयनों के समान घूम रहे थे।

नालो पर विकसित कमल-पुष्प रूठी हुई तरुणियो के वदन की समता करते थे। 'किडै' नामक पौधे, जिनमे अतिसुन्दर, सुगन्धित तथा रक्तवर्ण पुष्प भरे थे, सुरत-श्रांत युवतियो के रक्त अधरो का दृश्य उपस्थित करते थे।

अनेक प्रकार के मेढ़क जो (वर्षाकाल मे) शिक्षा देने में चतुर अध्यापकों के पास पाठ सीखनेवाले कोलाहल से पूर्ण वटुकों के समान बोल रहे थे, अब उन बुद्धिमानो के समान ही मौन हो गये, जो अपना वचन जहाँ फलप्रद होता हो, वही बोलते हैं और अन्यत्र मौन रहते हैं।

मेघों की विशाल वर्षा से हीन होकर मयूर अपने पंखो को सिकोड़े हुए दुःखी बने हुए और मन में कोई भी उमंग या फल की कामना से रहित होकर मिथिला-नगर के हंस (अर्थात्, देवी सीता) के समान ही व्याकुल हो दबे पड़े रहे।

समुद्र, मानो अपने तरंग-रूपी करो से नदी-रूपी अपनी पत्नियों के उमड़ते हुए जल-रूपी सुन्दर आँचल को पकड़कर खींच रहे थे और वे नदियाँ मानो अपने बलवान् पति का आलिंगन करके मदहास कर रही थी, जो (मंदहास) मुक्ताजल का दृश्य उपस्थित करते थे।

गुवाक (सुपारी)-वृक्षों के फल, शास्त्रों के ज्ञानमय वचनो का श्रवण करनेवाले