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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 502

४६४ | कम्ब रामायण

उठाया है, वह अभी वर्त्तमान है। भयंकर यम भी है। तुमलोगो को मारनेवाला बाण भी मेरे पास है।

विष के समान व्यक्तियो को दण्ड देना पाप नहीं है। मनु का यही विधान है। इस बात को तुम उस (सुग्रीव) के हृदय में बिठा दो, जिसने पाँच वर्ष (की आयु) में कुछ नहीं जाना।

तुम उससे यह सत्य वचन भी कहना कि यदि वह चाहता है कि नगर, प्रजा, राज्य तथा अपने बन्धुजन—इन सबके साथ स्वयं भी राज करता हुआ सुखी रहे, तो अविलंब यहाँ चला आये। यदि वह इस प्रकार नहीं आयगा, तो संसार में वानरी का नाम तक शेष नहीं रहेगा।

यदि सुग्रीव प्रभृति वानर, हमसे भी अधिक बलवान् वीर को खोजने का विचार करें, तो उनसे कहना कि तुमको (अर्थात्, लक्ष्मण को) जीतनेवाला तीनों भुवनों में तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नहीं है।

तुम पहले उन्हें नीतिमार्ग को समझाना। यदि उस वचन से उनका मन न बदले, तो तुम क्रुद्ध न होना और वहीं उन्हें मिटा न देना। किन्तु, उनके दिये उत्तरों को मेरे पास आकर कहना।—यों कहकर यशोभूषित (रामचन्द्र) ने लक्ष्मण को विदा किया।

रामचन्द्र की आज्ञा को सिर पर धारण करके, उनके चरणों को नमस्कार करके, किंचित् भी विलंब न करके अपनी विशाल पीठ पर तूणीर बाँध तथा शर-प्रयोग के लिए अतिश्रेष्ठ धनुष को कर में लिये हुए, अनन्यचित्त से वह (लक्ष्मण) दुर्गम मार्ग पर चल पड़ा।

(राम की) आज्ञा से चलनेवाला वह (लक्ष्मण) सुकुमार होते हुए भी (पूर्व में सुग्रीव जिस मार्ग से उन दोनों को किष्किंधा तक ले गया था उसी) पूर्व-प्रसिद्ध मार्ग से नहीं गया, किन्तु वृक्षों और शिलाओं को चूर-चूर करके उन्हें दूर फेंकता हुआ एक नया मार्ग बनाकर उसपर चला। (भाव यह है कि सुग्रीव ने प्रसिद्ध मार्ग में कोई रुकावट अथवा हानिकारक उपाय कर रखा होगा, इस विचार से लक्ष्मण उस मार्ग से नहीं गये।)

वीर-कंकण से भूषित लक्ष्मण के अरुण चरणों की चाप से, स्वर्ग को छूनेवाले मेरु पर्वत-जैसे ऊँचे उठे हुए पर्वत धरती में धँसकर समतल हो गये। पाताल में स्थित कर्ण- नेत्र (अर्थात्, सर्प या आदिशेष) भी लोगों की दृष्टि में आ गया।

बलिष्ठ वाली के भाई के पास जानेवाला मनुकुल श्रेष्ठ का अनुज, भयंकर अरण्य को भेदकर अतिवेग से आगे बढ़ता हुआ, गगन-चुम्बी सालवृक्षों को छेदनेवाले (राम के) बाण की समता करता था।

किसी दिग्गज के बच्चे के खो जाने पर उसे ढूँढ़ता हुआ, उसके पद-चिह्नों का अनुसरण करके दूसरा कोई दिग्गज चल पड़ा हो—सुग्रीव को ढूँढ़ता हुआ जानेवाला वह लक्ष्मण वैसे ही लगता था।

जिस प्रकार सूर्य ऊँचे उदयाचल से अस्ताचल पर जा पहुँचा हो, उसी प्रकार स्वर्ण की कांति से युक्त शरीरवाला लक्ष्मण एक ऊँचे उज्ज्वल पर्वत से (ऋष्यमूक से) दूसरे पर्वत पर (किष्किंधा पर) शीघ्र जा पहुँचा।