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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 545

किष्किन्धाकाण्ड ५३२

हे वीरो ! तुमलोग बहुश्रुत हो, इसलिए पापहीन हो गये हो । तुमलोग असत्य-रहित भी हो । तुमलोगो ने यहाँ आकर मुझे जीवन ही प्रदान किया । मेरे भाई की मृत्यु का समाचार देकर मुझे दुःख-सागर में नही डुबोया, किन्तु मेरी विपदा ही दूर की ।

हे मधुरभापियो ! सत्य की वृद्धि करने की महिमा से युक्त हे वीरो ! तुम सब उसी राम-नाम का जप करो । वैसा करने पर उस प्रभु की अत्युत्तम करुणा मुझे प्राप्त होगी ।

संपाति ने यों कहा । तब वानर यह सोचकर कि हम इस कथन की परीक्षा करेंगे, वैसे ही खड़े रहकर नीलवर्ण उस प्रभु के हितकारी नाम का उच्चारण करने लगे । तब बलवान् भुजावाले सपाति के पक्ष निकल आये ।

उज्ज्वल शरीरवाला संपाति, सब लोकों मे व्याप्त महाविष्णु ( के अवतार राम ) की कृपा को प्राप्त कर पंखो से युक्त हुआ । उसको पंख क्या मिल गये, मानों धुँआधार अग्नि को उगलनेवाले करवाळ को कोष मिल गया हो ।

सभी वानर, प्रख्यात रामचन्द्र का नाम उच्चारण करने से, पहले लुढ़कते हुए आनेवाले ( संपाति ) का हित होते हुए देखकर विस्मय से भर गये । वे प्रसन्न हुए और स्तब्ध भी हो गये । फिर, देवाधिदेव ( राम ) की प्रशस्ति गाने लगे ।

उन वानरों ने उस ( संपाति ) को नमस्कार किया । फिर, प्रश्न किया कि तुम अपना सारा पूर्व-वृत्तान्त कह सुनाओ । उनका वचन सुनकर संपाति अपने जीवन के बारे में कहने लगा ।

हे मातृ-तुल्य मित्रो ! हम दोनो, ( संपाति और जटायु ) तरंगायमान समुद्र से आवृत धरती के अन्धकार को मिटानेवाले सूर्य के सारथी अरुण के पुत्र होकर जनमे और मनोहर रंगवाले पखों से युक्त अति वेगवाले गिद्धो के राजा बने ।

हम दोनो, स्वर्ग मे स्थित देवलोक का दर्शन करने का विचार करके आकाश मे बहुत ऊपर उड़े, किन्तु उष्णकिरण ( सूर्य ) का रथ देखकर भी पूर्ण रूप से उसे नही देख पाये। तब अग्नि को भी तपानेवाले दिव्य अरुण किरणो से युक्त सूर्य हम पर क्रुद्ध हो उठा ।

ऊपर उड़े हुए मेरे अनुज के शरीर को, सूर्य का आतप अत्युग्र होकर तपाने लगा । तब वह बोला—हे मेरे बड़े भाई ! मुझे बचाओ । तब मैने अपने पक्षों को उस ( जटायु,) पर फैला दिया और वह मेरी छाया में आ गया । मैं मरा तो नही । किंतु मेरे पंख झुलस गये और मै धरती पर आ गिरा ।

मुझ धरती पर गिरे हुए को आकाश मे चमकनेवाले सूर्य ने देखा और अपार करुणा से भर गया । उसने यह कहा कि जनक की प्रिय पुत्री का अपहरण हो जाने पर ( उसका अन्वेषण करते हुए ) आनेवाले वानर जब राम-नाम का उच्चारण करेंगे, तब पहले-जैसे ही तुम्हारे पख निकल आयेंगे ।

जब मेरे पख झुलस गये, तब मैं उष्ण निःश्वास भरता हुआ, लोकसारग नामक महान् तपस्वी के निवासभूत पर्वत के सानु पर आ गिरा । मेरा शरीर और मन शिथिल हो गये थे । पीडा के बढ़ने से प्राणो का भार भी मैं वहन नही कर सकता था । मैंने प्राण-त्याग