कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३८ | कंब रामायण |
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हे वेगवान् गरुड से भी अधिक वेगवाले ! पूर्वकाल मे दो अंडो के एक साथ उत्पन्न होने पर, हम दोनो एक साथ ही जनमे थे, हम दोनो दीर्घकाल तक जीवित रहे । किन्तु, अब मुझे जीवित ही छोड़कर तुम अकेले वीरता-पूर्ण कार्य करके मृत हो गये । यह क्या उचित था ।
हे वीर ! रावण ने, यद्यपि त्रिभुवन में अपने शत्रुओ का वध किया था, तथापि क्या वह तुम्हारे सामने टिक भी सकता था ? उसने तुम्हे मार डाला ? यह कैसा समाचार है !
इस प्रकार कहकर रो-रोकर संपाति अत्यन्त शिथिल पड़ गया और मरणासन्न हो गया । तब अतिबली पर्वत-समान कंधोवाले हनुमान् ने समय के अनुकूल सात्वना के वचन उससे कहे ।
हनुमान् की सांत्वना पाकर सपाति कुछ शान्त हुआ। पूछा—यमतुल्य जटायु ने, उसको मारनेवाले करवालधारी रावण से किस कारण से युद्ध किया ? तब वायु-पुत्र यह वृत्तांत सुनाने लगा ।
हमारे प्रभु की देवी, नीति से अस्खलित शासनवाले ( जनक ) महाराज की पुत्री और उत्तम लक्षणो से पूर्ण सीता, कठोर मायावी के कपट के कारण अपने पति से वियुक्त हो गई ।
धर्म-मार्ग से कभी न हटनेवाले तुम्हारे भाई ने सीता का अपहरण करके ले जाने-वाले राक्षस को देखा और ( रावण से ) यह कहकर कि अमरो से अलंकृत कुंतलोवाली देवी को छोड़कर तुम हट जाओ, बलवान् रथ से युक्त उस रावण के साथ क्रुद्ध होकर युद्ध करने लगा ।
उस सत्यव्रत ( जटायु ) ने उस निष्ठुर पापी के रथ को ध्वस्त कर दिया । उसकी भुजाओ को छिन्न कर डाला । यो धीरे-धीरे जब इस प्रकार उसने उस ( रावण ) की शक्ति को भग्न किया, तब उसने महादेव के द्वारा प्रदत्त करवाल का प्रयोग किया, जिससे जटायु निहत हुआ—यो हनुमान् ने कहा ।
हनुमान् का कथन सुनकर अश्रु-भरित नयनोवाला सपाति, यह कहकर अत्यत प्रसन्न हुआ कि हे सत्यपूर्ण ! निर्मल अंतःकरण से ही जिसकी पवित्र मूर्त्ति जानी जा सकती है, ऐसे प्रभु के निमित्त मेरे भाई ने प्राण छोड़े । यह कार्य उत्तम है ! उत्तम ही है ।
हे वीर ! मेरा भाई, नव-पुष्पधारी हमारे रामचन्द्र की देवी, अरुण चरणोवाली एवं 'वंजी'-लता सदृश सीता की रक्षा के निमित्त अपने प्राण छोडे । अतः, अनन्त कीर्त्ति का भाजन बनकर अमर हो गया । उसे मृत मानना उचित नही है ।
धर्म-रूप प्रभु से प्रेम के साथ बघुत्व स्थापित करके मेरे भाई ने अपनी इच्छा से प्राण-त्याग दिये । ऐसे दुर्लभ पुरुषार्थ से युक्त उस जटायु की मृत्यु से क्या हानि हो सकती है ? इस भाग्य से बढकर सुखदायक वस्तु और क्या हो सकती है ?
वह ( संपाति ) यो अनेक प्रकार से रोता रहा । फिर, शीतल जलाशय मे जाकर अनुपम बलवाले उस सपाति ने स्नान किया । तदनंतर घनी मालाओ से भूषित वानरो के प्रति ये वचन कहे—