कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 543, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ५३७
पर कौन है ?—यों सोचता हुआ वह अपनी आँखों से इस प्रकार अश्रु बहाने लगा, जो धारा के रूप में बहकर समुद्र को भी भर दे ।
वह संपाति ऐसा था कि उसके आभरणों में स्थित, सान पर चढ़ाये गये रत्न विद्युत् की कांति बिखेर रहे थे। मद्धिम कांतिवाली उसकी आँखों से अश्रु-बिंदु झर रहे थे। मन की व्यथा के कारण वह मुँह खोलकर रो रहा था। वह ऐसा था, मानो कोई मेघ गरजता हुआ धरती पर चल रहा हो और बरस पड़ा हो।
वह शीघ्र गति से इस प्रकार चल रहा था कि उसके पैरों के नीचे आकर लता, वृक्ष, पर्वत आदि चूर-चूर हो रहे थे। उसका आकार ऐसा था, मानों रजताचल (कैलास-पर्वत) अति प्रबल प्रभंजन के चलने से लुढ़कता आ रहा हो।
इस प्रकार वह (संपाति) आ पहुँचा। वहाँ स्थित वानर उसे देखकर भयभीत हो काँपने लगे। केवल ज्ञानवान् हनुमान्, अपनी आँखों से अग्नि-कण निकालता हुआ क्रोध-पूर्ण वचन कह उठा कि हे धूर्त्त ! तुम कोई कपटी राक्षस हो, जो मायावेष धारण करके आये हो। मेरे सामने पड़कर अब कैसे बच सकते हो ? और उस (संपाति) के सम्मुख जाकर खड़ा हो गया।
किन्तु, हनुमान् ने उसकी मुखाकृति से पहचान लिया कि यह पापहीन चित्त-वाला है। मन में दुःखी है। वर्षा के समान आँखों से अश्रु बरसा रहा है, अतः निष्कपट है।
उस (संपाति) को आते हुए देखकर सूक्ष्म-शास्त्र ज्ञानवाला हनुमान् खड़ा हुआ। वह अपने मुँह से एक शब्द निकाले, इसके पहले ही संपाति ने प्रश्न किया—किसके लिए अजेय जटायु को किसने बड़ी वीरता से आहत किया ? विस्तार के साथ सारा वृत्तान्त बताओ।
तब हनुमान् ने कहा—यदि तुम अपना यथार्थ परिचय दोगे, तो मैं सब घटनाएँ सविस्तर तुम्हें सुनाऊँगा। तब गृध्रराज अपना वृत्तान्त कहने लगा।
हे विद्युत्-समान दाँतोंवाले ! मैं अभी तक मृत प्राणियों में सम्मिलित नहीं हुआ और फिर भी मेरा भाई मुझसे वियुक्त हो गया है, ऐसा दुर्भाग्य है मेरा। मैं उस (जटायु) का पूर्वज (बड़ा भाई) होकर उत्पन्न हुआ हूँ—यों अपने जीवन के बारे में (संपाति ने) कहा।
उसके कहे वचनों को सुनकर, दोषहीन हनुमान् दुःख के समुद्र में डूबने-उतराने लगा और बोला—वैरी रावण की तलवार से तुम्हारे अनुज की मृत्यु हुई।
हनुमान् का वचन सुनते ही संपाति ऐसे गिरा, जैसे वज्राहत पर्वत ढह गया हो। फिर, उष्ण निःश्वास भरकर व्याकुलप्राण हो निम्नलिखित वचन कहकर रोने लगा—
हे मेरे अनुज ! मेरे दीर्घ पक्ष (सूर्य के ताप से) झुलसकर नष्ट हो गये। पक्ष खोकर बँधे हुए-से पड़े रहने की अपेक्षा प्राण जाना ही उचित था। किन्तु, अविनाशी एक रथवाले (सूर्य) के अति उग्र आतप से भी भयभीत न होनेवाले (हे मेरे अनुज)! यह कैसा आश्चर्य है ? (कि मेरे पहले ही तुम्हारी मृत्यु हो गई।)
कमल में उत्पन्न ब्रह्मदेव स्थिर हैं, धरती और आकाश स्थिर हैं, अविनश्वर धर्म भी अभी बना है, शाश्वत कल्पवृक्ष भी मिटा नहीं है। किन्तु तुम नहीं रहे, यह कैसी दशा है !