कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें५३६ कंब रामायण
एव उनके अनुज भी निष्प्राण होंगे। फिर, वह समाचार जब अयोध्या में विदित होगा, तब भरत आदि क्या जीवित रह सकेंगे?
भरत, उनका अनुज, उनकी माताएँ, (अयोध्या) नगर के निवासी-सब मर जायेंगे, यह निश्चित है। हाय! मैं मिटा। हाय! जानकी नामक जगत्-प्रसिद्ध तपस्या- संपन्न दीप-समान नारी के कारण संसार के सब लोगों को कैसी अपार विपदा उत्पन्न हो गई है!—यों कहकर अंगद दुःखी हुआ।
पर्वत-समान दृढ कंधों तथा युद्धोत्साह से युक्त सिंह-सदृश अंगद के वचनों से जांबवान् के मन में ऐसी व्याकुलता उत्पन्न हुई, जैसे किसी ने अथार्य ज्वाला को उभाड़ दिया हो। भालुओं के राजा ने बड़े प्रेम से अंगद को देखकर कहा—
तुम और तुम्हारे पिता (सुग्रीव) दोनों को छोड़कर तुम्हारे वंश में और कोई पुत्र नहीं है (जो शासन-कार्य सँभाल सके), यही सोचकर हमने कहा (कि तुमको जीवित रहना है)। यदि यह कारण न भी हो, फिर भी नायक की मृत्यु की बात जिह्वा पर लाना उचित नहीं है।
हे विजयशील! तुम जाओ। राम और सुग्रीव जहाँ रहते हैं, वहाँ पहुँचकर उन्हें बताना कि सीता का पता नहीं मिला और हम सबने प्राण त्याग दिये—तुम उन लोगों के दुःख को शांत करने का प्रयत्न करना—यों अपार पराक्रमवाले जांबवान् ने कहा।
जांबवान् के यों कहने पर हनुमान् ने कहा—हे सूर्यसदृश वेगवालों! हमने अभी तक त्रिभुवन के एक भाग में भी पूरा-पूरा ढूँढ़कर नहीं देखा है; तो भी तुम लोग क्यों इस प्रकार शिथिल हो रहे हो, जैसे आगे चलने की शक्ति ही नहीं रह गई हो या कुछ सोचने का सामर्थ्य नहीं रह गया हो?
फिर, हनुमान् कहने लगा—पाताल में, ऊपर के लोक में, स्वर्णमय मेरु के शिखर पर तथा ब्रह्मांड के अन्य स्थानों में यदि हम उज्ज्वल ललाटवाली सीता का अन्वेषण करेंगे, तो हमारे राजा अवधि के व्यतीत हो जाने पर भी कुछ न कहेंगे।
अतः, अब भी सीता का अन्वेषण करना ही अच्छा है और इसी कार्य में, जिस प्रकार पुष्पालंकृत केशोंवाली देवी की विपदा को रोकने के लिए जटायु ने प्राण त्याग किये थे, उसी प्रकार हमें भी अपने प्राण छोड़ना उचित होगा। वैसा न करके यदि हम सभी प्राण छोड़ देंगे, तो इससे अपयश ही होगा—यों हनुमान् ने कहा।
हनुमान् के यह कहते ही, गृद्धों का राजा संपाति, यह सुनकर कि उसका अनुज, अगाध शक्तिवाला जटायु, मृत्यु को प्राप्त हो चुका है, शोक से भर गया और एक पर्वत के समान चलकर उन वानरों के निकट आ पहुँचा।
वह यह सोचकर कि हाय, नीतिवान् मेरा भाई मर गया, विक्षुब्धमन हो रहा था। उसका शरीर काँप रहा था। वह ऐसे चल रहा था, जैसे देवेंद्र के कुलिश से पक्षों के कट जाने पर कोई पर्वत पैदल ही जा रहा हो।
मेरे बलवान् भाई का वध करने की शक्ति रखनेवाला ऐसा शस्त्रधारी इस धरती