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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 549 में से

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किष्किन्धाकाण्ड ५३५

की आज्ञा का तो पूरा पालन किया (अर्थात्, सीता का अन्वेषण किया)। अब हमारे लिए करने को और कुछ नही रह गया है—यों कहते हुए अनेक प्रकार से विचार करने लगे।

क्या हम यही रहकर तपस्या करें ? यदि वह न हो, तो असाध्य विष को पीकर प्राण-त्याग करें ? इन दोनो में से जो उचित हो, वही करेगे। वे वानर, जिन्हे अपने प्राणो का भी भय नही था, यो सोचने लगे।

बलवान् सिंह के सदृश युवराज अंगद बहुत खिन्नचित्त हुआ और उन वानरो को देखकर जो तट पर टकराती हुई बड़ी वीथियों से युक्त समुद्र के निकट रहनेवाले महेन्द्र-पर्वत पर ऐसे खड़े थे, जैसे अनेक मेरु-पर्वत पंक्ति बाँधकर खडे हो, कहने लगा—तुमलोगों से मुझे कुछ कहना है।

हमलोगो ने पुरुषोत्तम रामचन्द्र के समक्ष, बड़ी भक्ति रखनेवालो के जैसे ही, प्रण किया था कि हमलोग आकाश से आवृत विश्व मे सर्वत्र जाकर सीता का अन्वेषण करेंगे। हमारा वह प्रण केवल गर्वमात्र नही था। उससे हमें बड़े अपयश के पात्र हो गये हैं।

'हम पूरा करेंगे'—यों कहकर जो कार्य हमने अपने ऊपर लिया, उसे पूरा नही कर पाये। अवधि के भीतर ही लौटकर यह कहना भी हमसे नही हो सका कि हम ढूँढ़कर भी सीता को कही नही देख सके। अब आगे भी यह कार्य पूरा हो सकेगा—इसका भी कोई लक्षण नही दीखता, ऐसी अवस्था में हमारा जीवित रहना क्या उचित है ?

(अवधि के व्यतीत हो जाने के पश्चात्, यदि हम लौटकर भी जायें, तो) मेरे पिता (सुग्रीव) क्रुद्ध होगे। हमारे प्रभु राम को भी बहुत दुःख होगा। उस दशा को मैं अपनी आँखो से नही देख सकूँगा। अतः, मै अपने प्राण त्याग देना चाहता हूँ। हे ज्ञानवान् लोगो ! मेरे इस निश्चय के बारे मे तुमलोग अपनी सम्मति दो—यों अंगद ने कहा।

तब जाम्बवान् ने कहा—हे लौह-स्तम्भ तथा पर्वत की समता करनेवाली भुजाओ से युक्त। तुमने ठीक कहा, पर यदि तुम अपने प्राण छोड़ दोगे, तो क्या हम यहाँ तुम्हारे लिए रोते बैठे रहेगे ? या प्रेमहीन होकर लौट जायेंगे और (सुग्रीव की) सेवा मे लग जायेंगे ?

हे युवराज तथा पौरुषवान् वीर ! लौट आकर कहने के लिए हमारे पास है ही क्या ? हमारा भी यही निर्णय है कि हम भी अपने प्राण त्याग देंगे। अतः, तुम्हारे लिए जीवित रहना ही उचित है।

जाम्बवान् का कथन सुनकर अंगद ने वानरो से कहा—हे पर्वत-तुल्य कंधोवाले वीरो ! तो क्या यह उचित है कि तुम सब यहाँ मृत्यु को प्राप्त होओ और अकेले मै लौटकर आऊँ ? क्या संसार को यह भायगा ?

इस विशाल संसार के निवासी यह कहे कि बड़े लोगो के अपवाद से डरकर जब इसके प्राण-प्रिय साथियों ने प्राण त्याग दिये, तब यह जीवित ही लौट आया, इससे पहले ही मैं स्वर्गलोक मे जा पहुँचूँगा। यह कहकर उसने फिर आगे कहा—

तो, मृत्यु-समाचार कोई-न-कोई मेरी माता और मेरे पिता सुग्रीव को देगा ही। यह समाचार पाकर कदाचित् वे अपने प्राण त्याग देंगे। वह देखकर धनुर्धर वीर (राम)

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