कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३४ | कंब रामायण |
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लगते हैं। मत्स्य के अंकुरों के समीप का कीचड़ लाल कुमुदपुष्प की गंध से सुगंधित रहता है।
पाप से रहित वे वानर-वीर, कावेरी नदी से सिंचित चोल देश को पारकर गृहस्थ धर्म से सुशोभित पर्वतमय चेर देश (मलयदेश) में जा पहुँचे। फिर, वहाँ से मधुर तमिल भाषा से युक्त दक्षिण (पाण्ड्य) देश में पहुँचे।
वह (पाण्ड्य) देश सप्तलोकों में विख्यात मुक्ताओं को एव त्रिविध तमिल¹ को प्रदान करने की महिमा से पूर्ण है। अतः, यदि यह कहें कि वह देश देवलोक के सदृश है, तो यह उपमा कैसे उचित होगी?
सरल चित्तवाले वे वानर, इस प्रकार के पाण्ड्यदेश में सर्वत्र ढूँढ़कर और घने केशपाशोंवाली (सीता) देवी को कहीं भी न देखकर दुःखी हुए और ऐसे शिथिल होकर चलते रहे, जैसे उनकी मृत्यु ही निकट आ गई हो।
फिर, वे वानर, दक्षिण समुद्र से चलनेवाले पवन से युक्त भूभाग को तय करके अंत में दिग्गज-सदृश प्रसिद्ध महेंद्र पर्वत पर जा पहुँचे। (१—५५)
अध्याय १५
संपाति पटल
वानर-वीरों ने दक्षिण के समुद्र को देखा, जो जल-भरे बादलों से पूर्ण आकाश के समान गरज रहा था और गगन को छूनेवाली ऊँची तरंग-रूपी हाथों को उठाकर उन वानरों के सम्मुख आकर उनका यथाविधि स्वागत कर रहा था और कह रहा था कि हरिण-सदृश विशाल नयनोंवाली सीता लंका में है।
अंगद आदि वीरों ने जिस सेना-समुदाय को आज्ञा देकर चारों ओर भेजा था कि तुमलोग आठों दिशाओं में अन्वेषण करके महेंद्र-पर्वत पर आ जाओ, वह सेना-समुदाय भी ऊँची तरंगों से पूर्ण एक दूसरे समुद्र के समान वहाँ आ पहुँचा।
सब वानर बिना कुछ बाधा के वहाँ आ पहुँचे। किन्तु, कमल से उत्पन्न घुँघराली अलकों से भूषित, अनुपम पातिव्रत्य से युक्त लक्ष्मी को कहीं नहीं देखा। वे अपने अगले कर्त्तव्य को न जानते हुए अटपटे शब्दों में कुछ कहने लगे।
(सुग्रीव के द्वारा निश्चित) एक मास की अवधि बीत गई। हम अपने कार्य में सफल नहीं हुए। अब श्रीरामचन्द्र भी अपने प्राण छोड़ देंगे। हमने अपने राजा (सुग्रीव)
¹ १. त्रिविध तमिल : तमिल में साहित्य के तीन अंग माने गये हैं—इयल = कविता, इशै = संगीत और नाटक = नाट्य।