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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 539

किष्किन्धाकाण्ड ५३३

वीथियों में अनेक वाद्यों की बड़ी ध्वनि को सुनकर मयूर, (संसार की) वृद्धि के कारणभूत मेघ का घोष समझकर नाच नहीं उठते। १ नृत्य करनेवालों के मृदंग की ध्वनि को सुनकर हंस भी (उसे मेघ-गर्जन समझकर) उड़ नहीं जाते। क्योंकि (ऐसी ध्वनियों से) चिर परिचित रहनेवाले प्राणी उनको सुनकर भ्रम कैसे कर सकते हैं?

अलंकृत रथ-सदृश नारिकेल-वृक्ष के कोमल तथा मुकुलित पुष्पों को देखकर मीन उन्हें सारस समझते हैं और भय से कंपित हो उठते हैं। मेढ़क, नुकीले कोरवाले शीतल कुमुद पुष्पों को देखकर, उन्हें अपने को निगलने के लिए आये हुए सर्प समझ लेते हैं और डर से चिल्ला उठते हैं।

केंकड़ों को पकड़नेवाली पंचम जाति की युवतियाँ, अति धवल शंखों से उत्पन्न मोतियों को देखकर उन्हें चित्तियोंवाले सारस पक्षियों के अंडे समझ लेती हैं और उन्हें (खाने के लिए) कछुए की पीठ पर तोड़ने लगती हैं।

शिशु-मर्कट कें अत्यन्त छोटे हाथ में, शाखाओं पर पकनेवाले कटहल का कोया है। उसपर पुष्पों से भरे उद्यान में जिस प्रकार भौंरे मँडराते रहते हैं, उसी प्रकार मक्खियाँ मँडरा रही हैं।

उस तोडमण्डल-प्रान्त में निवास करनेवाले लोग—संपन्न, संस्कृत एवं तमिल के पारंगत विद्वान् हैं, दुष्टों को दमन करनेवाले हैं, दानी हैं—इत्यादि विशेषताओं से प्रशंसित होते हैं। अतः, क्या कामधेनु भी ऐसे गृहस्थ-जनों की समता कर सकती है?

वे अनुपम वानर-वीर उस सुन्दर तोडमण्डल को पारकर विशाल कावेरी नदी से संयुक्त चोल देश में जा पहुँचे और लाल धान, ईख, सुपारी आदि से संकुल मार्गों से होकर कठिनाई से आगे बढ़ने लगे।

वहाँ के उन जलाशयों के तटों पर, जहाँ उभरी चोंचवाले सारस पक्षी निवास करते हैं, नारिकेल के वृक्ष बढ़े हुए हैं। वानर, कभी उन वृक्षों के कठभाग पर से खूब पककर नीचे गिरे हुए अति मनोहर मधुर फलों से टकराकर गिरते, तो कभी वहाँ प्रवाहित होनेवाली मधुधारा में फिसलकर गिर पड़ते थे।

काले रंगवाले जलकौवे, बाजों की-सी ध्वनि करनेवाले ईख के कोल्हुओं के पास इक्षुरस से भरे बड़े-बड़े पात्रों को देखकर उन्हें जलाशय समझ लेते थे और पंक्तियों में जाकर उनमें गोते लगाते थे।

पुष्पों से भरे, भ्रमर-समूहों से संकुल उद्यानों से मधु की धारा बहती रहती थी। उन प्रवाहों के यथार्थ रूप को न जानकर वानर, उन्हें मीनों से पूर्ण सरोवर समझकर उनमें हट जाते थे और वृक्षों पर जाकर विश्राम करते थे।

वहाँ के केतकी-वृक्ष फूलों के गुच्छों से लदे रहते हैं। उनके पास उगे हुए आम के पेड़ों के झुके हुए फल, केतकी-फूलों के पुष्प-रज से भर जाने से वैसी ही गंध से महँकने


१ भाव यह है कि वहाँ सदा वाद्यों के घोष तथा मृदंग की ध्वनि होती रहती है और मयूर तथा हंस इन शब्दों से भली भाँति परिचित रहते हैं।—अनु०