कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 538, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३२ | कंब रामायण |
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प्रदेशों को पार कर, अमृतसम जल से पूर्ण नारिकेल-फलों के बागों से भरे कुलिंद-देश को पार कर गये।
उन्होंने सप्तकोंकण-प्रदेशों को पार किया। पश्चिमी समुद्र तट पर उन प्रदेशों को, जहाँ मुक्ताराशियो, शंख, नीलोत्पल आदि से पूर्ण अनेक जलाशय थे, पार किया। फिर, उस अरुंधती-पर्वत के निकट पहुँचे, जिसके शिखर की परिक्रमा चंद्र की कला करती थी और देवता जिसे प्रणाम करते थे।
अरुंधती-पर्वत के निकट जाकर, वहाँ सुन्दरता को भी सुन्दर बनानेवाली सीता को कहीं न देखकर वे आगे बढ़ चले। फिर, उस मरकत-पर्वत पर जा पहुँचे, जहाँ गोपांगनाएँ आकर (पर्वत्य स्त्रियों से) दधि के बदले में मधु ले जाती थीं। फिर, वहाँ से चलकर (तमिल-देश की उत्तरी) सीमा बनी हुई वेंकटाचल-पर्वत पर जा पहुँचे।
उस वेंकटाचल-पर्वत के निर्झरों में मुनि, वेदज्ञ ब्राह्मण, पूर्वजन्म के पापों को मिटानेवाले तत्त्ववेत्ता, देव, अमरस्त्रियाँ, सिद्ध—सभी नित्य आकर स्नान करते हैं।
उस पर्वत पर देवता अपनी पंचेन्द्रियों को, तीव्र काम-वासना को, दूसरों के निंदा-वचनों को, रमणियों के सुन्दर दृष्टिबाणों को, जीतकर उत्तम तपस्या का आचरण करते रहते हैं।
उस वेंकटाचल पर, जो विजयी चक्रधारी कालमेघ-सदृश भगवान् के उज्ज्वल चरणों को धारण किये है, निवास करनेवाले जीव-जंतु भी मोक्ष-पद प्राप्त करते हैं; तो उन तपस्वियों के संबंध में क्या कहा जाय, जो सत्य ज्ञानवाले हैं !
इस प्रकार के उस वेंकटाचल को अपूर्व तपस्या-संपन्न भाग्यवान् लोग ही प्राप्त करते हैं। वे वानर-वीर, शाश्वत सुख को प्रदान करनेवाले प्रभु (श्री-निवास) के चरणों की नित्य सेवा करनेवाले उन तपस्वियों के चरणों पर प्रणत हुए।
कामरूप धारण करनेवाले उन वानर-वीरों ने (उन तपस्वियों की) चरण-धूलि को शिर पर धारण करने के पश्चात् उस वेंकटाचल पर, घुँघराले केशोंवाली, कलापितुल्य (सीता) देवी को ढूँढ़ा और फिर, ब्राह्मण का वेष धारण कर उस तोंडमडल प्रदेश मे जा पहुँचे, जो स्वच्छ एव तरंगायमान जलाशयों से भरा है।
वहाँ (तोंडमडल) के तट प्रदेशों में, पर्वतों की घाटियों, गोपों के बाँगों को घेरे हुए उद्यान, प्रभूत जल से संपन्न प्रदेश और स्वच्छ वीचियों से युक्त समुद्र से आवृत्त विशाल खेत हैं।
वहाँ कृषक झुंड बाँधकर हल जोतते हैं। जब वे अपने हाथ की छड़ी हिलाकर हाँक लगाते हैं, तब चर्ममय पैरोंवाले हंस उड़कर उन खेतों से भाग जाते हैं, जहाँ शालिधान, कटहल के पेड़ों की जड़ में लगे (पके) फलों से प्रवाहित मधु से सिंचित होते हैं। वे हंस अपने पैरों से धान के अंकुरों को रौंद देते हैं।
सुन्दरियों के केशों तक फैले हुए नयनों-जैसे मधु-भरे नीलोत्पल-समुदाय जिन खेतों के प्रान्तों में उगे रहते हैं, उनमें ग्वालिनों के जाँघों के सदृश कदली-वृक्ष लगे रहते हैं और उन कदली-वृक्षों पर सारस एव कोकिल सोये रहते हैं।