कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 537, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ५३१
सदृश दृष्टियों एव उस (मन्मथ) के धनुष के सदृश ही भौंहों से शोभित एवं अमृत-सदृश संगीत गानेवाली सुन्दरियाँ क्रमुक-वृक्षों पर लगे झूलों में बैठकर झूलती रहती थीं।
इस प्रकार के सुन्दर मुंडकसर के तट पर पहुँचकर वे वानर-वीर मन से भी अधिक तीव्र गति से ढूँढ़ने लगे। किंतु (पंचविध) शैलियों¹ से सजाने योग्य सुन्दर केश-पाशोंवाली लक्ष्मी के अवतार सीता को कहीं भी न देखकर अत्यन्त खिन्न होकर त्वरित गति से आगे बढ़ चले।
फिर, वे वानर, विशाल गगन को व्याप्तकर रहनेवाले उस पांडुपर्वत पर जा पहुँचे, जो ऐसा लगता था, मानों त्रिविक्रम के दीर्घ चरण के कारण (आकाश के छिद जाने से) गगन-तल से गंगा की धारा ही नीचे उतर रही हो।
वह पर्वत अपनी कांति से समस्त अंधकार को मिटा देता था। आकाश के चन्द्रमा को भी मंद कर देता था। वह करुणाहीन बलवान् राक्षस (रावण) को दबानेवाले कैलाश-पर्वत की समता करता था।
उस गगनोन्नत उज्ज्वल पर्वत के पास पहुँचकर वानर-वीर दत्तचित्त हो सीता को ढूँढ़ने लगे। किंतु, कहीं भी मधुर राग-सदृश बोलीवाली सीता को न देखकर मन में अत्यन्त व्याकुल और शिथिल हुए।
पवन के समान वेगवाले, निष्ठुर दृष्टियुक्त व्याघ्र के समान बलवाले, वे वानर-वीर उस पांडुपर्वत के प्रदेश को छोड़कर आगे बढ़े। फिर, वे गोदावरी नदी के समीप जा पहुँचे, जो राक्षस के द्वारा अपहृत हो जानेवाली सीता के केश-पाश से धरती पर खिसककर गिरी हुई पुष्पमाला के समान लगती थी।
उस गोदावरी नदी की तरंगायमान जलधारा, मुक्ता के सदृश स्वच्छता लिये हुए बह रही थी। वह ऐसी थी, मानों पृथ्वी देवी, सर्वपूज्य जनक के द्वारा वेदपाठ के साथ यज्ञार्थ धरती को जोतते समय उत्पन्न अनुपम सीता के दुःख से व्याकुल होकर अश्रु बहा रही हो।
वह (गोदावरी) नदी, जो रत्नों को और स्वर्ण को बहाती हुई अनेक अरण्यों से होकर मनोहर गति से प्रवाहित हो रही थी, ऐसी थी, मानों इस धरती को नापने का सूत्र हो। या जटायु के साथ युद्ध करते समय रावण के वक्ष पर से (जटायु के द्वारा) खोंचकर फेंका गया रत्नहार हो।
वे वानर-वीर, जो भले-बुरे का विवेचन करने में चतुर थे, उस गोदावरी नदी में भली भाँति ढूँढ़कर, उत्तम कंकण-धारिणी सीता को कहीं भी न पाकर आगे बढ़ चले और बहुत दूर चलकर, सब पापों को मिटानेवाली सुवर्णनदी के तट पर पहुँचे।
स्वर्णकीट, मधुमक्खी, काले भ्रमर, हंस तथा अन्य पक्षिगण—सबके समीप से होकर जानेवाले वानर, लाल धान तथा कमल-युक्त सरोवरों से भरे हुए जल-समृद्ध समतल
¹ तमिल के प्राचीन ग्रन्थों में केश को सजाने की पाँच शैलियों का वर्णन है।—अनु०