भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 536

५३० | कंब रामायण

प्राची दिशा मे निकला, तब सद्योविकसित कमल पर आसीन लक्ष्मी (के अवतारभूत सीता) को ढूंढ़ने लगे।

सीता का अन्वेषण करनेवाले वे वानर पेन्ना (उत्तर पेन्नार) नदी-रूपी सुन्दरी के पास जा पहुँचे, जो चक्रवाक को लज्जित करनेवाले पुलिन (सैकत-राशि) रूपी स्तनों, अमृतरस से पूर्ण, जल से स्थित रक्तकुमुद-रूपी अधर, मनोहर तथा उज्ज्वल दंतों एव प्रकाशमान वदन से युक्त थी।

ज्ञान की सीमा पर पहुँचे हुए उन वानर-वीरों ने, पर्वत की घाटियों मे, जहाँ मयूर नृत्य करते थे, नदी के मध्य में स्थित टापुओं में, पुष्प-वाटिकाओं में, शीतल किनारों-वाले पोखरो मे, शुभ्र पुष्पों से भरे हुए सरोवरों मे और निर्मल स्फटिक-शिलाओं मे---सर्वत्र (सीता को) खोजा।

फिर, वे उस नदी के (दक्षिणी) तट पर आ ठहरे, जो (नदी) अपने जल मे स्नान करनेवाले लोगों की जन्म-व्याधि को बहा देती थी और अपने अलंघ्य भँवरों में उत्तम रत्नों को बिखेरती थी।

(सीता के) अन्वेषण में लगे वे वानर, स्नान करने के योग्य उस नदी को तैरकर अनेक अरण्यो एव पर्वतो को पारकर, लहराती जलधाराओ से युक्त उस (दशनव नामक) देश मे जा पहुँचे, मानो वे मुक्तिलोक में ही पहुँच गये हों।

चंपक-वनों से युक्त तथा सस्यों से समृद्ध उस दशनव (.दशार्णव) नामक देश को पार कर, अति प्रख्यात उस विदर्भदेश में जा पहुँचे, जहाँ उशनस् नामक कवि (शुक्राचार्य) उत्पन्न हुए थे।

वे वानर, वैदर्भ की भूमि में आकर, वहाँ के सब ग्रामों में गये और वहाँ दर्भ एव यज्ञोपवीत से शोभित शरीरवाले मुनियों के दर्शन करते हुए (सीता का) अन्वेषण करते रहे।

वे ज्ञानवान् वानर-वीर, इस प्रकार अन्वेषण करते हुए, रक्त धान की फसलो मे भरे विदर्भ देश को भी शीघ्र पारकर उस दडकारण्य मे जा पहुँचे, जहाँ आत्मध्यान में निरत अनेक मुनि तप करते थे।

जहाँ मुनि, अपने शरीर मे विषयों का उपभोग करते हुए निवास करनेवाले पचेंद्रिय-रूपी शत्रुओं के लिए कठोर यम बनकर तपस्या करते रहते थे, ऐसे दंडकारण्य मे जाकर (सीता को) ढूँढ़ते हुए मुंडकमर नामक स्थान मे पहुँचे।

उस सरोवर का जल देवस्त्रियों के पीनस्तनों पर चंदन-लेप एवं पुष्प-मालाओ के ससर्ग से अत्यन्त सुगंधित हो रहा था। उसमे स्थित पक्षी भी वहाँ की (सुगधि से भरी) मछलियों को नहीं खाते थे।

वहाँ विद्याधरों के विरह मे पीडित स्त्रियाँ, वीणा-वाद्य का श्रवण कर, मन में अत्यन्त द्रवित होकर, व्याकुलता से काँप उठती थीं और उनकी आँखों से अश्रुजल यो बह चलता था कि हाथी भी उसमें डूब सकते थे।

रक्तकुमुद के समान मुँहवाली, कोकिल को लज्जित करनेवाली, मन्मथ के शरपुँज-