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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 535

अध्याय २४

मार्ग-गमन पटल

वानरों ने उस सुन्दर जलाशय को देखा। उसके मधुर जल को अंजलि मे भर-भर कर पिया। उसके तट पर स्थित मधुर फल और मधु का आहार किया। वहाँ एक मनोहर स्थान पर सुखद निद्रा की। उनके सोते समय, एक असुर वहाँ आ पहुँचा।

वह पर्वत की समता करता था। विशाल समुद्र की बराबरी करता था। कठोर हिंसक यम की तरह लगता था। क्रूरता का आगार जान पड़ता था। किंचित् भी सद्गुण से नितान्त विहीन था। गगनगत चन्द्रकला के सदृश एव विष-समान दाँतोंवाला था और अपनी आँखों से कोपाग्नि उगल रहा था।

बडे-बड़े मेघ, जो सृष्टि के आदिकारण थे, उसकी बाँहों पर एव उसके महदाकार शरीर पर फैले हुए थे, जिससे उसके शरीर पर अनुपम जल-धारा बहती रहती थी। अतः, वह निर्झरों से युक्त पर्वत के समान था।

वह दुष्ट असुर इतना प्रतापी था कि देव और असुर—दोनो के लिए वह अजेय था, तो अन्य कोई उसके साथ युद्ध करने का विचार तक कैसे अपने मन में ला सकता था।

चमकते हुए लाल-लाल केशोवाला, अपनी गति से चाक की समता करनेवाला वह असुर अपने हाथों को मलता हुआ उन वानरो के पास, जो धर्म से पूर्ण चित्तवाले थे और मार्ग-गमन से श्रांत होकर निद्रा मे मग्न पड़े थे, जा पहुँचा।

यम-सदृश उस (तुभिर नामक) असुर ने, यह कहता हुआ कि यह मेरा जलाशय है, यह जानते हुए भी यहाँ आनेवाले ये क्षुद्र प्राणी कौन हैं? यह कैसा आश्चर्य है? उत्तम अंगद के पुष्पायलंकृत वक्ष पर हाथ से प्रहार किया।

वीर अंगद निद्रा से जगकर और यह सोचकर कि यह असुर ही लंकेश्वर है, अपने को मारनेवाले उस असुर को ऐसा मारा कि युद्ध में निपुण वह असुर निष्प्राण ही गिर पड़ा।

उस समय, बिजली गिरने से टूटनेवाले पर्वत के समान, आहत होकर चिल्लाता हुआ जब वह असुर गिरा, तब भूतग्रस्त-से होकर सोये पड़े रहनेवाले सब वानर अंगद नामक आभरण से भूषित अपनी भुजाओं पर ताल ठोंकते हुए उठ खड़े हुए।

मारुति ने तारा-पुत्र से पूछा—यह कौन है? इसने क्या किया? अगद ने उत्तर दिया—हे सत्यनिरत! मै कुछ नही जानता।

तब जांबवान् ने कहा—मैने भली भाँति सोचकर जान लिया कि यह असुर कौन है। मांस-लगे शूल को धारण करनेवाला यह असुर तुमिर नामधारी दैत्य है और इस गंभीर सरोवर का रक्षक है।

मार्ग-गमन से विश्रांत वे वानर-वीर, यह सोचकर कि इस असुर के समान ही यहाँ और भी कई असुर होंगे, अपनी मीठी निद्रा त्याग कर उठ बैठे और जब अरुणकिरण