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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 534

५२८ कंब रामायण

तपस्विनी के कमल-समान चरणो को प्रणाम करके कहा—तुम्हे मै देवताओं के निवासभूत स्वर्ग प्रदान करूँगा।

अन्य वानरो ने हनुमान् से विनती की—हे महिमामय ! तुमने इस विवर के द्वार के घने अंधकार में प्रवेश करके मृत्यु के मुख से हमें बचाया। अब आगे का कर्त्तव्य भी तुम्ही सोचो। अवर्णनीय महिमावाले हनुमान् ने वैसा ही करने का निश्चय किया।

हनुमान् ने अन्य वानरों से यह कहा कि तुम लोग डरो नही और मंदहास के साथ सिंह-जैसे उठ खड़ा हुआ। उसने अपने हाथों को ऊपर उठाकर, अपने शरीर को गगनतल तक यों बढ़ाया कि वह विवर, जो ऊपर के गगन से बहुत नीचे स्थित था, फट गया और गगन से एकाकार हो गया।

वायुपुत्र के दोनो हाथ दो उज्ज्वल दंतों के समान ऊपर उठे हुए थे। जब वह विवर को भेदता हुआ ऊपर की ओर उठा, तो देखनेवालों के मन भय से भर गये। (उस समय) वह क्रोध के साथ पृथ्वी को उठा लानेवाले महावराह के समान दृष्टिगत हुआ।

उस समय वह (हनुमान्) उस वामन भगवान् के सुन्दर चरण की समता कर रहा था, जिस (वामन) ने (बलि से) तीन पग वसुधा माँगकर, दो पग से सारी सृष्टि को मापते हुए, कमल में निवास करनेवाले, उत्तम स्वरूपवाले ब्रह्मा की सृष्टि (अर्थात्, ब्रह्माण्ड) को आवृत करनेवाले आकाश-रूपी आवरण को छेद दिया था।

हनुमान् ने एक शत चतुर्दश योजन दूर तक उस विवर को भेद दिया और विवर में स्थित उस नगर को उखाड़कर पश्चिम के समुद्र मे फेंक दिया। फिर, मेघ के समान गरज उठा। वह दृश्य देखकर देवता भी काँप उठे।

हनुमान् के द्वारा फेंका गया वह नगर अब भी पश्चिमी समुद्र में, विवर-द्वीप के नाम से प्रख्यात है। विशाल ललाटवाली स्वयंप्रभा के साथ, पर्वत के समान कंधोंवाले वानर-वीर वहाँ से बाहर निकले और अपने मार्ग पर आये। सुन्दर ललाटवाली स्वयप्रभा स्वर्णमय स्वर्ग में जाने के लिए उद्यत हुई।

मेरु-सदृश सुन्दर स्तनोवाली वह अति सुन्दरी स्वयप्रभा, अत्युत्तम हनुमान् की अनेक प्रकार से प्रशसा करने के पश्चात् कल्प वृक्षों से युक्त स्वर्णमय स्वर्गलोक में जा पहुँची, जहाँ हेमा नामक उसकी सहेली निवास करती थी।

पराक्रमी वानर हनुमान् के बल-विक्रम की प्रशसा करते हुए चल पड़े। वे दिन-भर चलकर एक जलाशय के तटपर जा पहुँचे। उस समय रथारूढ प्रतापी सूर्य भी अस्ताचल पर जा पहुँचा। (१-७४)