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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

किष्किन्धाकाण्ड ५२७

उन्हे सुगन्धित जल से स्नान कराकर, अमृत-समान सुस्वादु भोजन दिया और मन को मोद देनेवाले मधुर वचन कहे ।

मारुति ने उस तपस्विनी के पुष्प-चरणो को नमस्कार करके प्रश्न किया—सार्वभौम यश के योग्य तपस्या करनेवाली हे देवी! आप मुझसे कहें कि इस नगर के अधिपति कौन हैं ? तब घनी जटाधारिणी उस तपस्विनी ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया ।

हे उत्तम! हरिणमुख मय ने, शास्त्रोक्त विधान से, अपना मुँह ऊपर की ओर उठाये, धूप और वायु का ही आहार करते हुए कठोर तपस्या की थी। उसी के फलस्वरूप चतुर्मुख ने यह विशाल नगर उसको प्रदान किया।

इसी प्रकार यह नगर उत्पन्न हुआ। उस दानव (मय) ने अप्सराओं में से एक सुन्दरी का संग प्राप्त करना चाहा। वह सुन्दरी मेरी प्राण-सखी थी। उस असुर की प्रार्थना पर मै स्वर्णनगर (अमरावती) से उस सुन्दरी को इस विवर के भीतर ले आई।

वह अप्सरा और वह दानव—दोनों चक्रवाक के जोडे के समान समागम-सुख में मत्त होकर, सब कुछ भूलकर अनेक दिनों तक इस विशाल नगर में निवास करते रहे। तांटक-धारिणी उस अप्सरा के साथ गाढ़े स्नेह-पाश मे बँधी हुई मैं भी यही रहने लगी।

हे बलशालिन्! जब अनेक दिन व्यतीत हुए, तब देवेंद्र उस उत्तम आभरण-धारिणी अप्सरा का अन्वेषण करने लगा। फिर, क्रोधी होकर उसने उस बलवान् असुर को मिटा दिया और मयूरपंख के मूल भाग के समान धवल-हासवाली उस अप्सरा से क्रोध से कहा कि तुम्हारा कार्य अत्यन्त क्षुद्र है।

देवेंद्र ने यों क्रुद्ध होकर उससे कहा—तुम सारी घटनाओं को कह सुनाओ। भली भाँति पके हुए बिंबफल-जैसे अधरवाली (हेमा नामक) उस अप्सरा ने आँखो के संकेत से सूचित किया कि इस मेरी सखी के कारण ही यह अपराध हुआ। तब इन्द्र ने सत्य को जानकर मुझसे कहा—तुम इसी नगर में इसकी (नगर की) रक्षा करती हुई पड़ी रहो।

उसकी यह आज्ञा होते ही, उसे नमस्कार कर मैने उससे पूछा—इस दुःख से मुझे कब मुक्ति मिलेगी ? कुछ अवधि निर्धारित कीजिए। तब इन्द्र यह कहकर अदृश्य हो गया कि जब राम की आज्ञा से बलवान् वानर इस नगर में आयेंगे, तब तुम्हारी विपदा का अन्त होगा।

हे उत्तम ! यहाँ मेरे भोजन के लिए फल आदि हैं, लेप के लिए चन्दन आदि हैं, पुष्प हैं, इतना ही नही, मनोहर वर्णवाले अनेक वस्त्र हैं, अन्य (आभरण आदि) वस्तुएँ भी हैं। किंतु इन सबका त्याग कर, आपके आगमन की ही प्रतीक्षा करती हुई चिरकाल से मैं तपस्या करती रही हूँ।

हे उत्तम ! यह विवर शत योजन विस्तीर्ण है। इस विवर से बाहर के लोक मे जाने का मार्ग मै नही जानती! यदि तुम लोग मेरी सहायता करो, तो मेरे उद्धार का मार्ग निकल आयगा। उसका कोई उपाय अपने मन मे सोचो—यों उसने कहा।

स्वयंप्रभा के इस प्रकार कहने पर हनुमान् ने इन्द्रियों पर दमन करनेवाली उस