कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 532, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५२६ | कंब रामायण |
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साथ संयुत करके, ( सब अंगों को ) समेटकर, श्वास को रोककर बैठी थी, जिससे उसकी अत्यन्त कंपनशील सूक्ष्म कटि बिलकुल निःस्पन्द हो गई थी और उभरे स्तनों का भार थम गया था।
कमल-पुष्पों के उपमान बननेवाले उसके अति सुन्दर पल्लव के समान कर, मनोहर स्वर्ण-जाँघों के मध्य स्थिर रूप में संयुत पड़े थे। ( उसके हृदय मे ) कामादि अन्तःशत्रु का समूल विनाश हो गया था। उसमें कामना का नाम तक नहीं रह गया था। उसकी इंद्रियाँ सद्ज्ञान में निमग्न हो गई थीं।
घने, दीर्घ तथा काले रगवाले उसके केश-पाश घनी जटा बनकर पृथ्वी पर लोट रहे थे। काम-बंधन उसे छोड़कर चला गया था। मन का पाश ( आसक्ति ) भी छूट चुका था। उसके नयनों से करुणा फूट रही थी।
वह तपस्विनी इस प्रकार आसीन थी। उसके समीप पहुँचकर वानरो ने उसको प्रणाम किया और अरुंधती कहने-योग्य सीता ही समझकर उतावले हो उठे। फिर, हनुमान् से उन ( वानरों ) ने कहा—क्या यही ( सीता ) देवी हैं ? ( राम के द्वारा ) बताये चिह्नों को देखकर कहो ?
मारुति ने उत्तर दिया—(देवी सीता का) कौन-सा गुण, कौन-सा चिह्न इसमें है—मै क्या बताऊँ ? ( अर्थात्, कोई भी चिह्न इसमे नही है )। 'क्या इस प्रकार के लक्षणवाली कही राम की पत्नी हो सकती है ? यदि अस्थियो की माला मुक्ताहार की समता कर सके, तो यह स्त्री भी सीता की समता कर सकेगी।
उस समय, उस दिव्य स्त्री ने अपना ध्यान भंग करके उन वानरों को देखा। उनका अपने सम्मुख आना अनुचित समझकर वह क्रुद्ध हो उठी और उनसे प्रश्न किया—मेरे इस नगर मे किसी का प्रवेश करना असंभव है। तुम इस नगर के निवासी भी नही हो, तो तुम यहाँ क्यों आये ? कौन हो तुम ? बताओ।
वानरों ने उत्तर दिया—उपद्रवी राक्षसो ने माया और वंचना करके सीता का अपहरण किया है। दोषरहित धर्ममार्ग की रक्षा करनेवाले रामचन्द्र के हम दूत हैं और उस स्थान की खोज में इस ससार मे घूम रहे हैं, जहाँ राक्षस ने सीता को छिपा रखा है।
वानरों के यह कहते ही, बैठी रहनेवाली वह (स्वयंप्रभा) उठकर खड़ी हो गई। उसके हृदय में उन ( वानरों ) पर दया उत्पन्न हुई और वह पर्वत-सदृश आनन्द से फूल उठी। फिर, उन ( वानरों ) से यह कहकर कि आप सबका स्वागत है, ( आपके आगमन से ) मै आनन्दित हुई—दोनों नयनों से आनंदाश्रु बहाने लगी।
नवीन तथा मनोहर हरिण के सदृश दीर्घ नयनोंवाली उस तपस्विनी ने प्रश्न किया—रामचन्द्र कहाँ रहते हैं ? तब कठोर आसक्ति से हीन मारुति ने ( रामचन्द्र का ) सारा वृत्तांत, आदि से अन्त तक, कह सुनाया।
उन वचनों को सुनकर वह बोली—अपने दोषरहित तप के प्रभाव से आज मुझे शाप से विमुक्ति प्राप्त हुई। यह कहकर उन वानरों के प्रति आदर-भाव दिखाने लगी।