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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 531

किष्किन्धाकाण्ड ५२३

वानरों ने उस पर्वत को देखा। भ्रम से यही सोचकर कि यह पर्वत तीक्ष्ण शूलधारी रावण का निवास है, उमग से भर गये और क्रोध से आँखें लाल करके चिनगारियों उगलने लगे।

इस पर्वत में हम मुग्धा हरिणी (समान देवी सीता) के दर्शन करेंगे और प्रभु के मन के ताप को दूर करेंगे।—यों विचार कर हर्ष से उत्फुल्ल हो निश्शंक उस पर्वत पर चढ़ने लगे।

(उन वानरो को देखकर) हाथी और शरभ डरकर भागने लगे। सर्वत्र व्याप्त हिंस्र सिंह अस्त-व्यस्त होकर भागे। पर्वत पर सर्वत्र ढूँढ़ने पर भी सीता को कहीं न देखकर वे वानर समझ गये कि (वह रावण का आवास नही, किन्तु) यह दूसरा कोई स्थान है। तब वे वहाँ से चले गये।

वे वानर, शत योजन विस्तीर्ण, स्वर्ग को छूनेवाले उस स्वर्णमय पर्वत मे दिन-भर खोजते रहे। वहाँ देवी सीता की टोह न पाकर फिर वहाँ से उतर चले।

अंगद आदि सेनापतियो ने दो 'वेल्लम' संख्यावाली अपनी सेना को आज्ञा दी कि तुमलोग स्वच्छ जल के पूर्ण दक्षिण दिशा के सारे भू-भाग में खोजकर महेंद्र पर्वत पर आ जाओ। ,फिर, वे उस उन्नत हेमकूट पर्वत से पृथक्-पृथक् दिशाओं मे चल पड़े।

वज्रमय कण्ठोंवाले उत्साही तथा विजयी हनुमान् आदि वानर-वीर मूड बाँधकर चल पड़े। उस मार्ग में वे एक ऐसे मरु-प्रदेश मे जा पहुँचे, जहाँ जल का नाम तक नही था और जिसे देखकर सूर्य भी भयभीत हो जाता था।

वहाँ कोई पक्षी नही था। कोई जंतु भी नही था। मधुपूर्ण पुष्पोवाले वृक्ष और घास का चिह्न तक नही था। वहाँ पत्थर भी जलकर भस्म बन गये थे। वहाँ शून्य के अतिरिक्त और कुछ नही था। वहाँ सब वस्तुएँ धूल बनकर उड़ती थी।

वहाँ पहुँचने पर उन वानरो की सब इन्द्रियाँ काँप उठीं। उनकी मति भ्रष्ट हो गई। उनके शरीर तपकर पसीने-पसीने हो गये और वे दक्षिण दिशा मे स्थित (कुंभी-पाक आदि) अग्निमय नरक में पड़े हुए अस्थिहीन कीटो के समान तड़प उठे।

वे अपनी जिह्वा को निकाले हुए थे। ज्यों-ज्यों अपने चरण धरती पर रखते थे, त्यो-त्यो ताप से उनके पैरो में छाले निकल आते थे। उनके शरीर वहाँ की बालू से भी अधिक तप उठे, जिससे वे यों तड़पने लगे, जैसे जले हुए पत्थर से चिनगारियाँ निकल रही हों।

कही विश्राम करने के लिए थोड़ी भी छाया न देखकर वे ऐसे व्याकुल हुए कि उनके प्राण शरीर से निकलने को हो गये। उनकी वह वेदना अपार थी। उस ताप से बचने के लिए उपाय करके अंत मे एक विवर के विशाल द्वार पर आ पहुँचे।

उन्होने विचार किया—अब उस रेगिस्तान में मरने के सिवा आगे जाना असंभव है। यदि इस विवर मे प्रवेश करेंगे, तो कम-से-कम इस उष्णता से तो बच जायेंगे। यो उस विवर के भीतर देखने का निश्चय करके वे उसमे उतर पड़े।

उस विवर के भीतर जाकर वे एक ऐसी कदरा में प्रविष्ट हुए, जिसमे चारो