भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 530
५२२कंब रामायण

मे ( विध्य-प्रात में ) ऐसे फैल गई कि उनके अतिरिक्त अन्य किसी के लिए वहाँ स्थान ही नही रहा ।

उत्तम बुद्धिवाले वे वानर, पृथक्-पृथक् होकर चलते । कुछ ( घाटियो मे ) उतर-कर चलते । कुछ ( शिखरों पर ) चढ़कर चलते । कुछ गगन-मार्ग से उछलकर चलते । उस पर्वत के पेड़ो के मध्य तथा जल की धाराओ मे रहनेवाले जीवों में से कही कोई ऐसा नही रहा, जिसे उन वानरो ने नही देखा हो । ऐसा कोई हो, तो वह ब्रह्मा की सृष्टि में ही नही है ।

धरती के शिरोभूषण के समान रहनेवाली दक्षिण दिशा ( देश ) में शीघ्र गति से जानेवाले वे वानर-वीर, चौदह योजन दूर गये और उस नर्मदा नदी पर जा पहुँचे, जहाँ भैंसी के बछड़े काले मेघो की पक्तियों के मध्य मिले पडे रहते हैं ।

हंसों के क्रीडा-स्थल, देव-रमणियोँ के स्नान के घाट, स्वर्गस्थ देवो के विहार-स्थान, मधुपान से मत्त भ्रमर-कुलो के गान से गुंजरित प्रदेश—सर्वत्र घूम-घूमकर उन वानरो ने ( सीता का ) अन्वेषण किया ।

वे वानर, जो अपूर्व नारी ( सीता ) का अन्वेषण करने के लिए चले थे, काली मिट्टी-रूपी केश-पाश को, अलक-रूपी भ्रमरों से आवृत्त सुगंधित कमल-रूपी वदन को तथा ( लहरों से छिटकाई जानेवाली ) मुक्ता-रूपी दाँतो को देखते थे, किंतु कही सीता के पूर्ण रूप को नही देख पाते थे ।

युद्ध करने के उत्साह से पूर्ण शरीरवाले, अनन्य चित्तवाले, धर्म एवं करुणा से पूर्ण स्वभाववाले वे वानर, उस नर्मदा नदी को पार करके गये, जिसमे मत्तगज और करिणियाँ पैठकर क्रीडा करती थी ।

फिर, हेमकूट नामक एक ऊँचे पर्वत पर आ पहुँचे, जिसके उज्ज्वल शिखरो से लहराती हुई जल-धाराएँ बह रही थी, जिसपर काति-पुज से भरे हुए रत्न-जल पडे थे और जो प्रसिद्ध दक्षिण दिशा की रक्षा करता है ।

वह पर्वत अपने चारों ओर इतना महान् प्रकाश फैलाता था कि आस-पास के सभी पर्वत, वृक्ष तथा अन्य पदार्थ भी तपाये हुए सोने के समान चमक रहे थे । वह मुक्तो के लोक ( स्वर्ग ) से भी अधिक ज्योतिर्मय था ।

वह पर्वत सब वस्तुओ पर अपनी घनी स्वर्ण आभा को इस प्रकार फैलाता था कि उससे उस पर्वत पर निवास करनेवाले पक्षी तथा विविध मृग, स्वर्ण-धूलि से अंकित रहनेवाले अत्युन्नत मेरु के निवासियो के समान बन जाते थे ।

सर्वत्र फैलनेवाली स्वर्ग-कांति के व्याप्त होने से स्वच्छ कांतिवाले लाल पद्मराग समूह के साथ झड़नेवाले निर्झर एव नदियाँ ऐसी लगती थी, जैसे भड़कती अग्नि-ज्वाला मे पिघला हुआ स्वर्ण बह रहा हो ।

( उस पर्वत पर आये हुए ) विद्याधरो के संगीत का नाद, स्वर्ण से उतरी शंख-समान ( धवल ) वलयधारिणी एव रूई-सदृश कोमल चरणोवाली अप्सराओ के नृत्य एव ताल का नाद, हाथियो का चिंघाड़, वाद्यमान मृदंग के समान मेघ-ध्वनि—ये सब मिलकर उस पर्वत में गूँज रहे थे ।