कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
| ५२२ | कंब रामायण |
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मे ( विध्य-प्रात में ) ऐसे फैल गई कि उनके अतिरिक्त अन्य किसी के लिए वहाँ स्थान ही नही रहा ।
उत्तम बुद्धिवाले वे वानर, पृथक्-पृथक् होकर चलते । कुछ ( घाटियो मे ) उतर-कर चलते । कुछ ( शिखरों पर ) चढ़कर चलते । कुछ गगन-मार्ग से उछलकर चलते । उस पर्वत के पेड़ो के मध्य तथा जल की धाराओ मे रहनेवाले जीवों में से कही कोई ऐसा नही रहा, जिसे उन वानरो ने नही देखा हो । ऐसा कोई हो, तो वह ब्रह्मा की सृष्टि में ही नही है ।
धरती के शिरोभूषण के समान रहनेवाली दक्षिण दिशा ( देश ) में शीघ्र गति से जानेवाले वे वानर-वीर, चौदह योजन दूर गये और उस नर्मदा नदी पर जा पहुँचे, जहाँ भैंसी के बछड़े काले मेघो की पक्तियों के मध्य मिले पडे रहते हैं ।
हंसों के क्रीडा-स्थल, देव-रमणियोँ के स्नान के घाट, स्वर्गस्थ देवो के विहार-स्थान, मधुपान से मत्त भ्रमर-कुलो के गान से गुंजरित प्रदेश—सर्वत्र घूम-घूमकर उन वानरो ने ( सीता का ) अन्वेषण किया ।
वे वानर, जो अपूर्व नारी ( सीता ) का अन्वेषण करने के लिए चले थे, काली मिट्टी-रूपी केश-पाश को, अलक-रूपी भ्रमरों से आवृत्त सुगंधित कमल-रूपी वदन को तथा ( लहरों से छिटकाई जानेवाली ) मुक्ता-रूपी दाँतो को देखते थे, किंतु कही सीता के पूर्ण रूप को नही देख पाते थे ।
युद्ध करने के उत्साह से पूर्ण शरीरवाले, अनन्य चित्तवाले, धर्म एवं करुणा से पूर्ण स्वभाववाले वे वानर, उस नर्मदा नदी को पार करके गये, जिसमे मत्तगज और करिणियाँ पैठकर क्रीडा करती थी ।
फिर, हेमकूट नामक एक ऊँचे पर्वत पर आ पहुँचे, जिसके उज्ज्वल शिखरो से लहराती हुई जल-धाराएँ बह रही थी, जिसपर काति-पुज से भरे हुए रत्न-जल पडे थे और जो प्रसिद्ध दक्षिण दिशा की रक्षा करता है ।
वह पर्वत अपने चारों ओर इतना महान् प्रकाश फैलाता था कि आस-पास के सभी पर्वत, वृक्ष तथा अन्य पदार्थ भी तपाये हुए सोने के समान चमक रहे थे । वह मुक्तो के लोक ( स्वर्ग ) से भी अधिक ज्योतिर्मय था ।
वह पर्वत सब वस्तुओ पर अपनी घनी स्वर्ण आभा को इस प्रकार फैलाता था कि उससे उस पर्वत पर निवास करनेवाले पक्षी तथा विविध मृग, स्वर्ण-धूलि से अंकित रहनेवाले अत्युन्नत मेरु के निवासियो के समान बन जाते थे ।
सर्वत्र फैलनेवाली स्वर्ग-कांति के व्याप्त होने से स्वच्छ कांतिवाले लाल पद्मराग समूह के साथ झड़नेवाले निर्झर एव नदियाँ ऐसी लगती थी, जैसे भड़कती अग्नि-ज्वाला मे पिघला हुआ स्वर्ण बह रहा हो ।
( उस पर्वत पर आये हुए ) विद्याधरो के संगीत का नाद, स्वर्ण से उतरी शंख-समान ( धवल ) वलयधारिणी एव रूई-सदृश कोमल चरणोवाली अप्सराओ के नृत्य एव ताल का नाद, हाथियो का चिंघाड़, वाद्यमान मृदंग के समान मेघ-ध्वनि—ये सब मिलकर उस पर्वत में गूँज रहे थे ।
किष्किन्धाकाण्ड ५२३
वानरों ने उस पर्वत को देखा। भ्रम से यही सोचकर कि यह पर्वत तीक्ष्ण शूलधारी रावण का निवास है, उमग से भर गये और क्रोध से आँखें लाल करके चिनगारियों उगलने लगे।
इस पर्वत में हम मुग्धा हरिणी (समान देवी सीता) के दर्शन करेंगे और प्रभु के मन के ताप को दूर करेंगे।—यों विचार कर हर्ष से उत्फुल्ल हो निश्शंक उस पर्वत पर चढ़ने लगे।
(उन वानरो को देखकर) हाथी और शरभ डरकर भागने लगे। सर्वत्र व्याप्त हिंस्र सिंह अस्त-व्यस्त होकर भागे। पर्वत पर सर्वत्र ढूँढ़ने पर भी सीता को कहीं न देखकर वे वानर समझ गये कि (वह रावण का आवास नही, किन्तु) यह दूसरा कोई स्थान है। तब वे वहाँ से चले गये।
वे वानर, शत योजन विस्तीर्ण, स्वर्ग को छूनेवाले उस स्वर्णमय पर्वत मे दिन-भर खोजते रहे। वहाँ देवी सीता की टोह न पाकर फिर वहाँ से उतर चले।
अंगद आदि सेनापतियो ने दो 'वेल्लम' संख्यावाली अपनी सेना को आज्ञा दी कि तुमलोग स्वच्छ जल के पूर्ण दक्षिण दिशा के सारे भू-भाग में खोजकर महेंद्र पर्वत पर आ जाओ। ,फिर, वे उस उन्नत हेमकूट पर्वत से पृथक्-पृथक् दिशाओं मे चल पड़े।
वज्रमय कण्ठोंवाले उत्साही तथा विजयी हनुमान् आदि वानर-वीर मूड बाँधकर चल पड़े। उस मार्ग में वे एक ऐसे मरु-प्रदेश मे जा पहुँचे, जहाँ जल का नाम तक नही था और जिसे देखकर सूर्य भी भयभीत हो जाता था।
वहाँ कोई पक्षी नही था। कोई जंतु भी नही था। मधुपूर्ण पुष्पोवाले वृक्ष और घास का चिह्न तक नही था। वहाँ पत्थर भी जलकर भस्म बन गये थे। वहाँ शून्य के अतिरिक्त और कुछ नही था। वहाँ सब वस्तुएँ धूल बनकर उड़ती थी।
वहाँ पहुँचने पर उन वानरो की सब इन्द्रियाँ काँप उठीं। उनकी मति भ्रष्ट हो गई। उनके शरीर तपकर पसीने-पसीने हो गये और वे दक्षिण दिशा मे स्थित (कुंभी-पाक आदि) अग्निमय नरक में पड़े हुए अस्थिहीन कीटो के समान तड़प उठे।
वे अपनी जिह्वा को निकाले हुए थे। ज्यों-ज्यों अपने चरण धरती पर रखते थे, त्यो-त्यो ताप से उनके पैरो में छाले निकल आते थे। उनके शरीर वहाँ की बालू से भी अधिक तप उठे, जिससे वे यों तड़पने लगे, जैसे जले हुए पत्थर से चिनगारियाँ निकल रही हों।
कही विश्राम करने के लिए थोड़ी भी छाया न देखकर वे ऐसे व्याकुल हुए कि उनके प्राण शरीर से निकलने को हो गये। उनकी वह वेदना अपार थी। उस ताप से बचने के लिए उपाय करके अंत मे एक विवर के विशाल द्वार पर आ पहुँचे।
उन्होने विचार किया—अब उस रेगिस्तान में मरने के सिवा आगे जाना असंभव है। यदि इस विवर मे प्रवेश करेंगे, तो कम-से-कम इस उष्णता से तो बच जायेंगे। यो उस विवर के भीतर देखने का निश्चय करके वे उसमे उतर पड़े।
उस विवर के भीतर जाकर वे एक ऐसी कदरा में प्रविष्ट हुए, जिसमे चारो
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साथ संयुत करके, ( सब अंगों को ) समेटकर, श्वास को रोककर बैठी थी, जिससे उसकी अत्यन्त कंपनशील सूक्ष्म कटि बिलकुल निःस्पन्द हो गई थी और उभरे स्तनों का भार थम गया था।
कमल-पुष्पों के उपमान बननेवाले उसके अति सुन्दर पल्लव के समान कर, मनोहर स्वर्ण-जाँघों के मध्य स्थिर रूप में संयुत पड़े थे। ( उसके हृदय मे ) कामादि अन्तःशत्रु का समूल विनाश हो गया था। उसमें कामना का नाम तक नहीं रह गया था। उसकी इंद्रियाँ सद्ज्ञान में निमग्न हो गई थीं।
घने, दीर्घ तथा काले रगवाले उसके केश-पाश घनी जटा बनकर पृथ्वी पर लोट रहे थे। काम-बंधन उसे छोड़कर चला गया था। मन का पाश ( आसक्ति ) भी छूट चुका था। उसके नयनों से करुणा फूट रही थी।
वह तपस्विनी इस प्रकार आसीन थी। उसके समीप पहुँचकर वानरो ने उसको प्रणाम किया और अरुंधती कहने-योग्य सीता ही समझकर उतावले हो उठे। फिर, हनुमान् से उन ( वानरों ) ने कहा—क्या यही ( सीता ) देवी हैं ? ( राम के द्वारा ) बताये चिह्नों को देखकर कहो ?
मारुति ने उत्तर दिया—(देवी सीता का) कौन-सा गुण, कौन-सा चिह्न इसमें है—मै क्या बताऊँ ? ( अर्थात्, कोई भी चिह्न इसमे नही है )। 'क्या इस प्रकार के लक्षणवाली कही राम की पत्नी हो सकती है ? यदि अस्थियो की माला मुक्ताहार की समता कर सके, तो यह स्त्री भी सीता की समता कर सकेगी।
उस समय, उस दिव्य स्त्री ने अपना ध्यान भंग करके उन वानरों को देखा। उनका अपने सम्मुख आना अनुचित समझकर वह क्रुद्ध हो उठी और उनसे प्रश्न किया—मेरे इस नगर मे किसी का प्रवेश करना असंभव है। तुम इस नगर के निवासी भी नही हो, तो तुम यहाँ क्यों आये ? कौन हो तुम ? बताओ।
वानरों ने उत्तर दिया—उपद्रवी राक्षसो ने माया और वंचना करके सीता का अपहरण किया है। दोषरहित धर्ममार्ग की रक्षा करनेवाले रामचन्द्र के हम दूत हैं और उस स्थान की खोज में इस ससार मे घूम रहे हैं, जहाँ राक्षस ने सीता को छिपा रखा है।
वानरों के यह कहते ही, बैठी रहनेवाली वह (स्वयंप्रभा) उठकर खड़ी हो गई। उसके हृदय में उन ( वानरों ) पर दया उत्पन्न हुई और वह पर्वत-सदृश आनन्द से फूल उठी। फिर, उन ( वानरों ) से यह कहकर कि आप सबका स्वागत है, ( आपके आगमन से ) मै आनन्दित हुई—दोनों नयनों से आनंदाश्रु बहाने लगी।
नवीन तथा मनोहर हरिण के सदृश दीर्घ नयनोंवाली उस तपस्विनी ने प्रश्न किया—रामचन्द्र कहाँ रहते हैं ? तब कठोर आसक्ति से हीन मारुति ने ( रामचन्द्र का ) सारा वृत्तांत, आदि से अन्त तक, कह सुनाया।
उन वचनों को सुनकर वह बोली—अपने दोषरहित तप के प्रभाव से आज मुझे शाप से विमुक्ति प्राप्त हुई। यह कहकर उन वानरों के प्रति आदर-भाव दिखाने लगी।
किष्किन्धाकाण्ड ५२७
उन्हे सुगन्धित जल से स्नान कराकर, अमृत-समान सुस्वादु भोजन दिया और मन को मोद देनेवाले मधुर वचन कहे ।
मारुति ने उस तपस्विनी के पुष्प-चरणो को नमस्कार करके प्रश्न किया—सार्वभौम यश के योग्य तपस्या करनेवाली हे देवी! आप मुझसे कहें कि इस नगर के अधिपति कौन हैं ? तब घनी जटाधारिणी उस तपस्विनी ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया ।
हे उत्तम! हरिणमुख मय ने, शास्त्रोक्त विधान से, अपना मुँह ऊपर की ओर उठाये, धूप और वायु का ही आहार करते हुए कठोर तपस्या की थी। उसी के फलस्वरूप चतुर्मुख ने यह विशाल नगर उसको प्रदान किया।
इसी प्रकार यह नगर उत्पन्न हुआ। उस दानव (मय) ने अप्सराओं में से एक सुन्दरी का संग प्राप्त करना चाहा। वह सुन्दरी मेरी प्राण-सखी थी। उस असुर की प्रार्थना पर मै स्वर्णनगर (अमरावती) से उस सुन्दरी को इस विवर के भीतर ले आई।
वह अप्सरा और वह दानव—दोनों चक्रवाक के जोडे के समान समागम-सुख में मत्त होकर, सब कुछ भूलकर अनेक दिनों तक इस विशाल नगर में निवास करते रहे। तांटक-धारिणी उस अप्सरा के साथ गाढ़े स्नेह-पाश मे बँधी हुई मैं भी यही रहने लगी।
हे बलशालिन्! जब अनेक दिन व्यतीत हुए, तब देवेंद्र उस उत्तम आभरण-धारिणी अप्सरा का अन्वेषण करने लगा। फिर, क्रोधी होकर उसने उस बलवान् असुर को मिटा दिया और मयूरपंख के मूल भाग के समान धवल-हासवाली उस अप्सरा से क्रोध से कहा कि तुम्हारा कार्य अत्यन्त क्षुद्र है।
देवेंद्र ने यों क्रुद्ध होकर उससे कहा—तुम सारी घटनाओं को कह सुनाओ। भली भाँति पके हुए बिंबफल-जैसे अधरवाली (हेमा नामक) उस अप्सरा ने आँखो के संकेत से सूचित किया कि इस मेरी सखी के कारण ही यह अपराध हुआ। तब इन्द्र ने सत्य को जानकर मुझसे कहा—तुम इसी नगर में इसकी (नगर की) रक्षा करती हुई पड़ी रहो।
उसकी यह आज्ञा होते ही, उसे नमस्कार कर मैने उससे पूछा—इस दुःख से मुझे कब मुक्ति मिलेगी ? कुछ अवधि निर्धारित कीजिए। तब इन्द्र यह कहकर अदृश्य हो गया कि जब राम की आज्ञा से बलवान् वानर इस नगर में आयेंगे, तब तुम्हारी विपदा का अन्त होगा।
हे उत्तम ! यहाँ मेरे भोजन के लिए फल आदि हैं, लेप के लिए चन्दन आदि हैं, पुष्प हैं, इतना ही नही, मनोहर वर्णवाले अनेक वस्त्र हैं, अन्य (आभरण आदि) वस्तुएँ भी हैं। किंतु इन सबका त्याग कर, आपके आगमन की ही प्रतीक्षा करती हुई चिरकाल से मैं तपस्या करती रही हूँ।
हे उत्तम ! यह विवर शत योजन विस्तीर्ण है। इस विवर से बाहर के लोक मे जाने का मार्ग मै नही जानती! यदि तुम लोग मेरी सहायता करो, तो मेरे उद्धार का मार्ग निकल आयगा। उसका कोई उपाय अपने मन मे सोचो—यों उसने कहा।
स्वयंप्रभा के इस प्रकार कहने पर हनुमान् ने इन्द्रियों पर दमन करनेवाली उस
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तपस्विनी के कमल-समान चरणो को प्रणाम करके कहा—तुम्हे मै देवताओं के निवासभूत स्वर्ग प्रदान करूँगा।
अन्य वानरो ने हनुमान् से विनती की—हे महिमामय ! तुमने इस विवर के द्वार के घने अंधकार में प्रवेश करके मृत्यु के मुख से हमें बचाया। अब आगे का कर्त्तव्य भी तुम्ही सोचो। अवर्णनीय महिमावाले हनुमान् ने वैसा ही करने का निश्चय किया।
हनुमान् ने अन्य वानरों से यह कहा कि तुम लोग डरो नही और मंदहास के साथ सिंह-जैसे उठ खड़ा हुआ। उसने अपने हाथों को ऊपर उठाकर, अपने शरीर को गगनतल तक यों बढ़ाया कि वह विवर, जो ऊपर के गगन से बहुत नीचे स्थित था, फट गया और गगन से एकाकार हो गया।
वायुपुत्र के दोनो हाथ दो उज्ज्वल दंतों के समान ऊपर उठे हुए थे। जब वह विवर को भेदता हुआ ऊपर की ओर उठा, तो देखनेवालों के मन भय से भर गये। (उस समय) वह क्रोध के साथ पृथ्वी को उठा लानेवाले महावराह के समान दृष्टिगत हुआ।
उस समय वह (हनुमान्) उस वामन भगवान् के सुन्दर चरण की समता कर रहा था, जिस (वामन) ने (बलि से) तीन पग वसुधा माँगकर, दो पग से सारी सृष्टि को मापते हुए, कमल में निवास करनेवाले, उत्तम स्वरूपवाले ब्रह्मा की सृष्टि (अर्थात्, ब्रह्माण्ड) को आवृत करनेवाले आकाश-रूपी आवरण को छेद दिया था।
हनुमान् ने एक शत चतुर्दश योजन दूर तक उस विवर को भेद दिया और विवर में स्थित उस नगर को उखाड़कर पश्चिम के समुद्र मे फेंक दिया। फिर, मेघ के समान गरज उठा। वह दृश्य देखकर देवता भी काँप उठे।
हनुमान् के द्वारा फेंका गया वह नगर अब भी पश्चिमी समुद्र में, विवर-द्वीप के नाम से प्रख्यात है। विशाल ललाटवाली स्वयंप्रभा के साथ, पर्वत के समान कंधोंवाले वानर-वीर वहाँ से बाहर निकले और अपने मार्ग पर आये। सुन्दर ललाटवाली स्वयप्रभा स्वर्णमय स्वर्ग में जाने के लिए उद्यत हुई।
मेरु-सदृश सुन्दर स्तनोवाली वह अति सुन्दरी स्वयप्रभा, अत्युत्तम हनुमान् की अनेक प्रकार से प्रशसा करने के पश्चात् कल्प वृक्षों से युक्त स्वर्णमय स्वर्गलोक में जा पहुँची, जहाँ हेमा नामक उसकी सहेली निवास करती थी।
पराक्रमी वानर हनुमान् के बल-विक्रम की प्रशसा करते हुए चल पड़े। वे दिन-भर चलकर एक जलाशय के तटपर जा पहुँचे। उस समय रथारूढ प्रतापी सूर्य भी अस्ताचल पर जा पहुँचा। (१-७४)
अध्याय २४
मार्ग-गमन पटल
वानरों ने उस सुन्दर जलाशय को देखा। उसके मधुर जल को अंजलि मे भर-भर कर पिया। उसके तट पर स्थित मधुर फल और मधु का आहार किया। वहाँ एक मनोहर स्थान पर सुखद निद्रा की। उनके सोते समय, एक असुर वहाँ आ पहुँचा।
वह पर्वत की समता करता था। विशाल समुद्र की बराबरी करता था। कठोर हिंसक यम की तरह लगता था। क्रूरता का आगार जान पड़ता था। किंचित् भी सद्गुण से नितान्त विहीन था। गगनगत चन्द्रकला के सदृश एव विष-समान दाँतोंवाला था और अपनी आँखों से कोपाग्नि उगल रहा था।
बडे-बड़े मेघ, जो सृष्टि के आदिकारण थे, उसकी बाँहों पर एव उसके महदाकार शरीर पर फैले हुए थे, जिससे उसके शरीर पर अनुपम जल-धारा बहती रहती थी। अतः, वह निर्झरों से युक्त पर्वत के समान था।
वह दुष्ट असुर इतना प्रतापी था कि देव और असुर—दोनो के लिए वह अजेय था, तो अन्य कोई उसके साथ युद्ध करने का विचार तक कैसे अपने मन में ला सकता था।
चमकते हुए लाल-लाल केशोवाला, अपनी गति से चाक की समता करनेवाला वह असुर अपने हाथों को मलता हुआ उन वानरो के पास, जो धर्म से पूर्ण चित्तवाले थे और मार्ग-गमन से श्रांत होकर निद्रा मे मग्न पड़े थे, जा पहुँचा।
यम-सदृश उस (तुभिर नामक) असुर ने, यह कहता हुआ कि यह मेरा जलाशय है, यह जानते हुए भी यहाँ आनेवाले ये क्षुद्र प्राणी कौन हैं? यह कैसा आश्चर्य है? उत्तम अंगद के पुष्पायलंकृत वक्ष पर हाथ से प्रहार किया।
वीर अंगद निद्रा से जगकर और यह सोचकर कि यह असुर ही लंकेश्वर है, अपने को मारनेवाले उस असुर को ऐसा मारा कि युद्ध में निपुण वह असुर निष्प्राण ही गिर पड़ा।
उस समय, बिजली गिरने से टूटनेवाले पर्वत के समान, आहत होकर चिल्लाता हुआ जब वह असुर गिरा, तब भूतग्रस्त-से होकर सोये पड़े रहनेवाले सब वानर अंगद नामक आभरण से भूषित अपनी भुजाओं पर ताल ठोंकते हुए उठ खड़े हुए।
मारुति ने तारा-पुत्र से पूछा—यह कौन है? इसने क्या किया? अगद ने उत्तर दिया—हे सत्यनिरत! मै कुछ नही जानता।
तब जांबवान् ने कहा—मैने भली भाँति सोचकर जान लिया कि यह असुर कौन है। मांस-लगे शूल को धारण करनेवाला यह असुर तुमिर नामधारी दैत्य है और इस गंभीर सरोवर का रक्षक है।
मार्ग-गमन से विश्रांत वे वानर-वीर, यह सोचकर कि इस असुर के समान ही यहाँ और भी कई असुर होंगे, अपनी मीठी निद्रा त्याग कर उठ बैठे और जब अरुणकिरण
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प्राची दिशा मे निकला, तब सद्योविकसित कमल पर आसीन लक्ष्मी (के अवतारभूत सीता) को ढूंढ़ने लगे।
सीता का अन्वेषण करनेवाले वे वानर पेन्ना (उत्तर पेन्नार) नदी-रूपी सुन्दरी के पास जा पहुँचे, जो चक्रवाक को लज्जित करनेवाले पुलिन (सैकत-राशि) रूपी स्तनों, अमृतरस से पूर्ण, जल से स्थित रक्तकुमुद-रूपी अधर, मनोहर तथा उज्ज्वल दंतों एव प्रकाशमान वदन से युक्त थी।
ज्ञान की सीमा पर पहुँचे हुए उन वानर-वीरों ने, पर्वत की घाटियों मे, जहाँ मयूर नृत्य करते थे, नदी के मध्य में स्थित टापुओं में, पुष्प-वाटिकाओं में, शीतल किनारों-वाले पोखरो मे, शुभ्र पुष्पों से भरे हुए सरोवरों मे और निर्मल स्फटिक-शिलाओं मे---सर्वत्र (सीता को) खोजा।
फिर, वे उस नदी के (दक्षिणी) तट पर आ ठहरे, जो (नदी) अपने जल मे स्नान करनेवाले लोगों की जन्म-व्याधि को बहा देती थी और अपने अलंघ्य भँवरों में उत्तम रत्नों को बिखेरती थी।
(सीता के) अन्वेषण में लगे वे वानर, स्नान करने के योग्य उस नदी को तैरकर अनेक अरण्यो एव पर्वतो को पारकर, लहराती जलधाराओ से युक्त उस (दशनव नामक) देश मे जा पहुँचे, मानो वे मुक्तिलोक में ही पहुँच गये हों।
चंपक-वनों से युक्त तथा सस्यों से समृद्ध उस दशनव (.दशार्णव) नामक देश को पार कर, अति प्रख्यात उस विदर्भदेश में जा पहुँचे, जहाँ उशनस् नामक कवि (शुक्राचार्य) उत्पन्न हुए थे।
वे वानर, वैदर्भ की भूमि में आकर, वहाँ के सब ग्रामों में गये और वहाँ दर्भ एव यज्ञोपवीत से शोभित शरीरवाले मुनियों के दर्शन करते हुए (सीता का) अन्वेषण करते रहे।
वे ज्ञानवान् वानर-वीर, इस प्रकार अन्वेषण करते हुए, रक्त धान की फसलो मे भरे विदर्भ देश को भी शीघ्र पारकर उस दडकारण्य मे जा पहुँचे, जहाँ आत्मध्यान में निरत अनेक मुनि तप करते थे।
जहाँ मुनि, अपने शरीर मे विषयों का उपभोग करते हुए निवास करनेवाले पचेंद्रिय-रूपी शत्रुओं के लिए कठोर यम बनकर तपस्या करते रहते थे, ऐसे दंडकारण्य मे जाकर (सीता को) ढूँढ़ते हुए मुंडकमर नामक स्थान मे पहुँचे।
उस सरोवर का जल देवस्त्रियों के पीनस्तनों पर चंदन-लेप एवं पुष्प-मालाओ के ससर्ग से अत्यन्त सुगंधित हो रहा था। उसमे स्थित पक्षी भी वहाँ की (सुगधि से भरी) मछलियों को नहीं खाते थे।
वहाँ विद्याधरों के विरह मे पीडित स्त्रियाँ, वीणा-वाद्य का श्रवण कर, मन में अत्यन्त द्रवित होकर, व्याकुलता से काँप उठती थीं और उनकी आँखों से अश्रुजल यो बह चलता था कि हाथी भी उसमें डूब सकते थे।
रक्तकुमुद के समान मुँहवाली, कोकिल को लज्जित करनेवाली, मन्मथ के शरपुँज-
किष्किन्धाकाण्ड ५३१
सदृश दृष्टियों एव उस (मन्मथ) के धनुष के सदृश ही भौंहों से शोभित एवं अमृत-सदृश संगीत गानेवाली सुन्दरियाँ क्रमुक-वृक्षों पर लगे झूलों में बैठकर झूलती रहती थीं।
इस प्रकार के सुन्दर मुंडकसर के तट पर पहुँचकर वे वानर-वीर मन से भी अधिक तीव्र गति से ढूँढ़ने लगे। किंतु (पंचविध) शैलियों¹ से सजाने योग्य सुन्दर केश-पाशोंवाली लक्ष्मी के अवतार सीता को कहीं भी न देखकर अत्यन्त खिन्न होकर त्वरित गति से आगे बढ़ चले।
फिर, वे वानर, विशाल गगन को व्याप्तकर रहनेवाले उस पांडुपर्वत पर जा पहुँचे, जो ऐसा लगता था, मानों त्रिविक्रम के दीर्घ चरण के कारण (आकाश के छिद जाने से) गगन-तल से गंगा की धारा ही नीचे उतर रही हो।
वह पर्वत अपनी कांति से समस्त अंधकार को मिटा देता था। आकाश के चन्द्रमा को भी मंद कर देता था। वह करुणाहीन बलवान् राक्षस (रावण) को दबानेवाले कैलाश-पर्वत की समता करता था।
उस गगनोन्नत उज्ज्वल पर्वत के पास पहुँचकर वानर-वीर दत्तचित्त हो सीता को ढूँढ़ने लगे। किंतु, कहीं भी मधुर राग-सदृश बोलीवाली सीता को न देखकर मन में अत्यन्त व्याकुल और शिथिल हुए।
पवन के समान वेगवाले, निष्ठुर दृष्टियुक्त व्याघ्र के समान बलवाले, वे वानर-वीर उस पांडुपर्वत के प्रदेश को छोड़कर आगे बढ़े। फिर, वे गोदावरी नदी के समीप जा पहुँचे, जो राक्षस के द्वारा अपहृत हो जानेवाली सीता के केश-पाश से धरती पर खिसककर गिरी हुई पुष्पमाला के समान लगती थी।
उस गोदावरी नदी की तरंगायमान जलधारा, मुक्ता के सदृश स्वच्छता लिये हुए बह रही थी। वह ऐसी थी, मानों पृथ्वी देवी, सर्वपूज्य जनक के द्वारा वेदपाठ के साथ यज्ञार्थ धरती को जोतते समय उत्पन्न अनुपम सीता के दुःख से व्याकुल होकर अश्रु बहा रही हो।
वह (गोदावरी) नदी, जो रत्नों को और स्वर्ण को बहाती हुई अनेक अरण्यों से होकर मनोहर गति से प्रवाहित हो रही थी, ऐसी थी, मानों इस धरती को नापने का सूत्र हो। या जटायु के साथ युद्ध करते समय रावण के वक्ष पर से (जटायु के द्वारा) खोंचकर फेंका गया रत्नहार हो।
वे वानर-वीर, जो भले-बुरे का विवेचन करने में चतुर थे, उस गोदावरी नदी में भली भाँति ढूँढ़कर, उत्तम कंकण-धारिणी सीता को कहीं भी न पाकर आगे बढ़ चले और बहुत दूर चलकर, सब पापों को मिटानेवाली सुवर्णनदी के तट पर पहुँचे।
स्वर्णकीट, मधुमक्खी, काले भ्रमर, हंस तथा अन्य पक्षिगण—सबके समीप से होकर जानेवाले वानर, लाल धान तथा कमल-युक्त सरोवरों से भरे हुए जल-समृद्ध समतल
¹ तमिल के प्राचीन ग्रन्थों में केश को सजाने की पाँच शैलियों का वर्णन है।—अनु०
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प्रदेशों को पार कर, अमृतसम जल से पूर्ण नारिकेल-फलों के बागों से भरे कुलिंद-देश को पार कर गये।
उन्होंने सप्तकोंकण-प्रदेशों को पार किया। पश्चिमी समुद्र तट पर उन प्रदेशों को, जहाँ मुक्ताराशियो, शंख, नीलोत्पल आदि से पूर्ण अनेक जलाशय थे, पार किया। फिर, उस अरुंधती-पर्वत के निकट पहुँचे, जिसके शिखर की परिक्रमा चंद्र की कला करती थी और देवता जिसे प्रणाम करते थे।
अरुंधती-पर्वत के निकट जाकर, वहाँ सुन्दरता को भी सुन्दर बनानेवाली सीता को कहीं न देखकर वे आगे बढ़ चले। फिर, उस मरकत-पर्वत पर जा पहुँचे, जहाँ गोपांगनाएँ आकर (पर्वत्य स्त्रियों से) दधि के बदले में मधु ले जाती थीं। फिर, वहाँ से चलकर (तमिल-देश की उत्तरी) सीमा बनी हुई वेंकटाचल-पर्वत पर जा पहुँचे।
उस वेंकटाचल-पर्वत के निर्झरों में मुनि, वेदज्ञ ब्राह्मण, पूर्वजन्म के पापों को मिटानेवाले तत्त्ववेत्ता, देव, अमरस्त्रियाँ, सिद्ध—सभी नित्य आकर स्नान करते हैं।
उस पर्वत पर देवता अपनी पंचेन्द्रियों को, तीव्र काम-वासना को, दूसरों के निंदा-वचनों को, रमणियों के सुन्दर दृष्टिबाणों को, जीतकर उत्तम तपस्या का आचरण करते रहते हैं।
उस वेंकटाचल पर, जो विजयी चक्रधारी कालमेघ-सदृश भगवान् के उज्ज्वल चरणों को धारण किये है, निवास करनेवाले जीव-जंतु भी मोक्ष-पद प्राप्त करते हैं; तो उन तपस्वियों के संबंध में क्या कहा जाय, जो सत्य ज्ञानवाले हैं !
इस प्रकार के उस वेंकटाचल को अपूर्व तपस्या-संपन्न भाग्यवान् लोग ही प्राप्त करते हैं। वे वानर-वीर, शाश्वत सुख को प्रदान करनेवाले प्रभु (श्री-निवास) के चरणों की नित्य सेवा करनेवाले उन तपस्वियों के चरणों पर प्रणत हुए।
कामरूप धारण करनेवाले उन वानर-वीरों ने (उन तपस्वियों की) चरण-धूलि को शिर पर धारण करने के पश्चात् उस वेंकटाचल पर, घुँघराले केशोंवाली, कलापितुल्य (सीता) देवी को ढूँढ़ा और फिर, ब्राह्मण का वेष धारण कर उस तोंडमडल प्रदेश मे जा पहुँचे, जो स्वच्छ एव तरंगायमान जलाशयों से भरा है।
वहाँ (तोंडमडल) के तट प्रदेशों में, पर्वतों की घाटियों, गोपों के बाँगों को घेरे हुए उद्यान, प्रभूत जल से संपन्न प्रदेश और स्वच्छ वीचियों से युक्त समुद्र से आवृत्त विशाल खेत हैं।
वहाँ कृषक झुंड बाँधकर हल जोतते हैं। जब वे अपने हाथ की छड़ी हिलाकर हाँक लगाते हैं, तब चर्ममय पैरोंवाले हंस उड़कर उन खेतों से भाग जाते हैं, जहाँ शालिधान, कटहल के पेड़ों की जड़ में लगे (पके) फलों से प्रवाहित मधु से सिंचित होते हैं। वे हंस अपने पैरों से धान के अंकुरों को रौंद देते हैं।
सुन्दरियों के केशों तक फैले हुए नयनों-जैसे मधु-भरे नीलोत्पल-समुदाय जिन खेतों के प्रान्तों में उगे रहते हैं, उनमें ग्वालिनों के जाँघों के सदृश कदली-वृक्ष लगे रहते हैं और उन कदली-वृक्षों पर सारस एव कोकिल सोये रहते हैं।
किष्किन्धाकाण्ड ५३३
वीथियों में अनेक वाद्यों की बड़ी ध्वनि को सुनकर मयूर, (संसार की) वृद्धि के कारणभूत मेघ का घोष समझकर नाच नहीं उठते। १ नृत्य करनेवालों के मृदंग की ध्वनि को सुनकर हंस भी (उसे मेघ-गर्जन समझकर) उड़ नहीं जाते। क्योंकि (ऐसी ध्वनियों से) चिर परिचित रहनेवाले प्राणी उनको सुनकर भ्रम कैसे कर सकते हैं?
अलंकृत रथ-सदृश नारिकेल-वृक्ष के कोमल तथा मुकुलित पुष्पों को देखकर मीन उन्हें सारस समझते हैं और भय से कंपित हो उठते हैं। मेढ़क, नुकीले कोरवाले शीतल कुमुद पुष्पों को देखकर, उन्हें अपने को निगलने के लिए आये हुए सर्प समझ लेते हैं और डर से चिल्ला उठते हैं।
केंकड़ों को पकड़नेवाली पंचम जाति की युवतियाँ, अति धवल शंखों से उत्पन्न मोतियों को देखकर उन्हें चित्तियोंवाले सारस पक्षियों के अंडे समझ लेती हैं और उन्हें (खाने के लिए) कछुए की पीठ पर तोड़ने लगती हैं।
शिशु-मर्कट कें अत्यन्त छोटे हाथ में, शाखाओं पर पकनेवाले कटहल का कोया है। उसपर पुष्पों से भरे उद्यान में जिस प्रकार भौंरे मँडराते रहते हैं, उसी प्रकार मक्खियाँ मँडरा रही हैं।
उस तोडमण्डल-प्रान्त में निवास करनेवाले लोग—संपन्न, संस्कृत एवं तमिल के पारंगत विद्वान् हैं, दुष्टों को दमन करनेवाले हैं, दानी हैं—इत्यादि विशेषताओं से प्रशंसित होते हैं। अतः, क्या कामधेनु भी ऐसे गृहस्थ-जनों की समता कर सकती है?
वे अनुपम वानर-वीर उस सुन्दर तोडमण्डल को पारकर विशाल कावेरी नदी से संयुक्त चोल देश में जा पहुँचे और लाल धान, ईख, सुपारी आदि से संकुल मार्गों से होकर कठिनाई से आगे बढ़ने लगे।
वहाँ के उन जलाशयों के तटों पर, जहाँ उभरी चोंचवाले सारस पक्षी निवास करते हैं, नारिकेल के वृक्ष बढ़े हुए हैं। वानर, कभी उन वृक्षों के कठभाग पर से खूब पककर नीचे गिरे हुए अति मनोहर मधुर फलों से टकराकर गिरते, तो कभी वहाँ प्रवाहित होनेवाली मधुधारा में फिसलकर गिर पड़ते थे।
काले रंगवाले जलकौवे, बाजों की-सी ध्वनि करनेवाले ईख के कोल्हुओं के पास इक्षुरस से भरे बड़े-बड़े पात्रों को देखकर उन्हें जलाशय समझ लेते थे और पंक्तियों में जाकर उनमें गोते लगाते थे।
पुष्पों से भरे, भ्रमर-समूहों से संकुल उद्यानों से मधु की धारा बहती रहती थी। उन प्रवाहों के यथार्थ रूप को न जानकर वानर, उन्हें मीनों से पूर्ण सरोवर समझकर उनमें हट जाते थे और वृक्षों पर जाकर विश्राम करते थे।
वहाँ के केतकी-वृक्ष फूलों के गुच्छों से लदे रहते हैं। उनके पास उगे हुए आम के पेड़ों के झुके हुए फल, केतकी-फूलों के पुष्प-रज से भर जाने से वैसी ही गंध से महँकने
१ भाव यह है कि वहाँ सदा वाद्यों के घोष तथा मृदंग की ध्वनि होती रहती है और मयूर तथा हंस इन शब्दों से भली भाँति परिचित रहते हैं।—अनु०
| ५३४ | कंब रामायण |
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लगते हैं। मत्स्य के अंकुरों के समीप का कीचड़ लाल कुमुदपुष्प की गंध से सुगंधित रहता है।
पाप से रहित वे वानर-वीर, कावेरी नदी से सिंचित चोल देश को पारकर गृहस्थ धर्म से सुशोभित पर्वतमय चेर देश (मलयदेश) में जा पहुँचे। फिर, वहाँ से मधुर तमिल भाषा से युक्त दक्षिण (पाण्ड्य) देश में पहुँचे।
वह (पाण्ड्य) देश सप्तलोकों में विख्यात मुक्ताओं को एव त्रिविध तमिल¹ को प्रदान करने की महिमा से पूर्ण है। अतः, यदि यह कहें कि वह देश देवलोक के सदृश है, तो यह उपमा कैसे उचित होगी?
सरल चित्तवाले वे वानर, इस प्रकार के पाण्ड्यदेश में सर्वत्र ढूँढ़कर और घने केशपाशोंवाली (सीता) देवी को कहीं भी न देखकर दुःखी हुए और ऐसे शिथिल होकर चलते रहे, जैसे उनकी मृत्यु ही निकट आ गई हो।
फिर, वे वानर, दक्षिण समुद्र से चलनेवाले पवन से युक्त भूभाग को तय करके अंत में दिग्गज-सदृश प्रसिद्ध महेंद्र पर्वत पर जा पहुँचे। (१—५५)
अध्याय १५
संपाति पटल
वानर-वीरों ने दक्षिण के समुद्र को देखा, जो जल-भरे बादलों से पूर्ण आकाश के समान गरज रहा था और गगन को छूनेवाली ऊँची तरंग-रूपी हाथों को उठाकर उन वानरों के सम्मुख आकर उनका यथाविधि स्वागत कर रहा था और कह रहा था कि हरिण-सदृश विशाल नयनोंवाली सीता लंका में है।
अंगद आदि वीरों ने जिस सेना-समुदाय को आज्ञा देकर चारों ओर भेजा था कि तुमलोग आठों दिशाओं में अन्वेषण करके महेंद्र-पर्वत पर आ जाओ, वह सेना-समुदाय भी ऊँची तरंगों से पूर्ण एक दूसरे समुद्र के समान वहाँ आ पहुँचा।
सब वानर बिना कुछ बाधा के वहाँ आ पहुँचे। किन्तु, कमल से उत्पन्न घुँघराली अलकों से भूषित, अनुपम पातिव्रत्य से युक्त लक्ष्मी को कहीं नहीं देखा। वे अपने अगले कर्त्तव्य को न जानते हुए अटपटे शब्दों में कुछ कहने लगे।
(सुग्रीव के द्वारा निश्चित) एक मास की अवधि बीत गई। हम अपने कार्य में सफल नहीं हुए। अब श्रीरामचन्द्र भी अपने प्राण छोड़ देंगे। हमने अपने राजा (सुग्रीव)
¹ १. त्रिविध तमिल : तमिल में साहित्य के तीन अंग माने गये हैं—इयल = कविता, इशै = संगीत और नाटक = नाट्य।
किष्किन्धाकाण्ड ५३५
की आज्ञा का तो पूरा पालन किया (अर्थात्, सीता का अन्वेषण किया)। अब हमारे लिए करने को और कुछ नही रह गया है—यों कहते हुए अनेक प्रकार से विचार करने लगे।
क्या हम यही रहकर तपस्या करें ? यदि वह न हो, तो असाध्य विष को पीकर प्राण-त्याग करें ? इन दोनो में से जो उचित हो, वही करेगे। वे वानर, जिन्हे अपने प्राणो का भी भय नही था, यो सोचने लगे।
बलवान् सिंह के सदृश युवराज अंगद बहुत खिन्नचित्त हुआ और उन वानरो को देखकर जो तट पर टकराती हुई बड़ी वीथियों से युक्त समुद्र के निकट रहनेवाले महेन्द्र-पर्वत पर ऐसे खड़े थे, जैसे अनेक मेरु-पर्वत पंक्ति बाँधकर खडे हो, कहने लगा—तुमलोगों से मुझे कुछ कहना है।
हमलोगो ने पुरुषोत्तम रामचन्द्र के समक्ष, बड़ी भक्ति रखनेवालो के जैसे ही, प्रण किया था कि हमलोग आकाश से आवृत विश्व मे सर्वत्र जाकर सीता का अन्वेषण करेंगे। हमारा वह प्रण केवल गर्वमात्र नही था। उससे हमें बड़े अपयश के पात्र हो गये हैं।
'हम पूरा करेंगे'—यों कहकर जो कार्य हमने अपने ऊपर लिया, उसे पूरा नही कर पाये। अवधि के भीतर ही लौटकर यह कहना भी हमसे नही हो सका कि हम ढूँढ़कर भी सीता को कही नही देख सके। अब आगे भी यह कार्य पूरा हो सकेगा—इसका भी कोई लक्षण नही दीखता, ऐसी अवस्था में हमारा जीवित रहना क्या उचित है ?
(अवधि के व्यतीत हो जाने के पश्चात्, यदि हम लौटकर भी जायें, तो) मेरे पिता (सुग्रीव) क्रुद्ध होगे। हमारे प्रभु राम को भी बहुत दुःख होगा। उस दशा को मैं अपनी आँखो से नही देख सकूँगा। अतः, मै अपने प्राण त्याग देना चाहता हूँ। हे ज्ञानवान् लोगो ! मेरे इस निश्चय के बारे मे तुमलोग अपनी सम्मति दो—यों अंगद ने कहा।
तब जाम्बवान् ने कहा—हे लौह-स्तम्भ तथा पर्वत की समता करनेवाली भुजाओ से युक्त। तुमने ठीक कहा, पर यदि तुम अपने प्राण छोड़ दोगे, तो क्या हम यहाँ तुम्हारे लिए रोते बैठे रहेगे ? या प्रेमहीन होकर लौट जायेंगे और (सुग्रीव की) सेवा मे लग जायेंगे ?
हे युवराज तथा पौरुषवान् वीर ! लौट आकर कहने के लिए हमारे पास है ही क्या ? हमारा भी यही निर्णय है कि हम भी अपने प्राण त्याग देंगे। अतः, तुम्हारे लिए जीवित रहना ही उचित है।
जाम्बवान् का कथन सुनकर अंगद ने वानरो से कहा—हे पर्वत-तुल्य कंधोवाले वीरो ! तो क्या यह उचित है कि तुम सब यहाँ मृत्यु को प्राप्त होओ और अकेले मै लौटकर आऊँ ? क्या संसार को यह भायगा ?
इस विशाल संसार के निवासी यह कहे कि बड़े लोगो के अपवाद से डरकर जब इसके प्राण-प्रिय साथियों ने प्राण त्याग दिये, तब यह जीवित ही लौट आया, इससे पहले ही मैं स्वर्गलोक मे जा पहुँचूँगा। यह कहकर उसने फिर आगे कहा—
तो, मृत्यु-समाचार कोई-न-कोई मेरी माता और मेरे पिता सुग्रीव को देगा ही। यह समाचार पाकर कदाचित् वे अपने प्राण त्याग देंगे। वह देखकर धनुर्धर वीर (राम)
५३६ कंब रामायण
एव उनके अनुज भी निष्प्राण होंगे। फिर, वह समाचार जब अयोध्या में विदित होगा, तब भरत आदि क्या जीवित रह सकेंगे?
भरत, उनका अनुज, उनकी माताएँ, (अयोध्या) नगर के निवासी-सब मर जायेंगे, यह निश्चित है। हाय! मैं मिटा। हाय! जानकी नामक जगत्-प्रसिद्ध तपस्या- संपन्न दीप-समान नारी के कारण संसार के सब लोगों को कैसी अपार विपदा उत्पन्न हो गई है!—यों कहकर अंगद दुःखी हुआ।
पर्वत-समान दृढ कंधों तथा युद्धोत्साह से युक्त सिंह-सदृश अंगद के वचनों से जांबवान् के मन में ऐसी व्याकुलता उत्पन्न हुई, जैसे किसी ने अथार्य ज्वाला को उभाड़ दिया हो। भालुओं के राजा ने बड़े प्रेम से अंगद को देखकर कहा—
तुम और तुम्हारे पिता (सुग्रीव) दोनों को छोड़कर तुम्हारे वंश में और कोई पुत्र नहीं है (जो शासन-कार्य सँभाल सके), यही सोचकर हमने कहा (कि तुमको जीवित रहना है)। यदि यह कारण न भी हो, फिर भी नायक की मृत्यु की बात जिह्वा पर लाना उचित नहीं है।
हे विजयशील! तुम जाओ। राम और सुग्रीव जहाँ रहते हैं, वहाँ पहुँचकर उन्हें बताना कि सीता का पता नहीं मिला और हम सबने प्राण त्याग दिये—तुम उन लोगों के दुःख को शांत करने का प्रयत्न करना—यों अपार पराक्रमवाले जांबवान् ने कहा।
जांबवान् के यों कहने पर हनुमान् ने कहा—हे सूर्यसदृश वेगवालों! हमने अभी तक त्रिभुवन के एक भाग में भी पूरा-पूरा ढूँढ़कर नहीं देखा है; तो भी तुम लोग क्यों इस प्रकार शिथिल हो रहे हो, जैसे आगे चलने की शक्ति ही नहीं रह गई हो या कुछ सोचने का सामर्थ्य नहीं रह गया हो?
फिर, हनुमान् कहने लगा—पाताल में, ऊपर के लोक में, स्वर्णमय मेरु के शिखर पर तथा ब्रह्मांड के अन्य स्थानों में यदि हम उज्ज्वल ललाटवाली सीता का अन्वेषण करेंगे, तो हमारे राजा अवधि के व्यतीत हो जाने पर भी कुछ न कहेंगे।
अतः, अब भी सीता का अन्वेषण करना ही अच्छा है और इसी कार्य में, जिस प्रकार पुष्पालंकृत केशोंवाली देवी की विपदा को रोकने के लिए जटायु ने प्राण त्याग किये थे, उसी प्रकार हमें भी अपने प्राण छोड़ना उचित होगा। वैसा न करके यदि हम सभी प्राण छोड़ देंगे, तो इससे अपयश ही होगा—यों हनुमान् ने कहा।
हनुमान् के यह कहते ही, गृद्धों का राजा संपाति, यह सुनकर कि उसका अनुज, अगाध शक्तिवाला जटायु, मृत्यु को प्राप्त हो चुका है, शोक से भर गया और एक पर्वत के समान चलकर उन वानरों के निकट आ पहुँचा।
वह यह सोचकर कि हाय, नीतिवान् मेरा भाई मर गया, विक्षुब्धमन हो रहा था। उसका शरीर काँप रहा था। वह ऐसे चल रहा था, जैसे देवेंद्र के कुलिश से पक्षों के कट जाने पर कोई पर्वत पैदल ही जा रहा हो।
मेरे बलवान् भाई का वध करने की शक्ति रखनेवाला ऐसा शस्त्रधारी इस धरती
किष्किन्धाकाण्ड ५३७
पर कौन है ?—यों सोचता हुआ वह अपनी आँखों से इस प्रकार अश्रु बहाने लगा, जो धारा के रूप में बहकर समुद्र को भी भर दे ।
वह संपाति ऐसा था कि उसके आभरणों में स्थित, सान पर चढ़ाये गये रत्न विद्युत् की कांति बिखेर रहे थे। मद्धिम कांतिवाली उसकी आँखों से अश्रु-बिंदु झर रहे थे। मन की व्यथा के कारण वह मुँह खोलकर रो रहा था। वह ऐसा था, मानो कोई मेघ गरजता हुआ धरती पर चल रहा हो और बरस पड़ा हो।
वह शीघ्र गति से इस प्रकार चल रहा था कि उसके पैरों के नीचे आकर लता, वृक्ष, पर्वत आदि चूर-चूर हो रहे थे। उसका आकार ऐसा था, मानों रजताचल (कैलास-पर्वत) अति प्रबल प्रभंजन के चलने से लुढ़कता आ रहा हो।
इस प्रकार वह (संपाति) आ पहुँचा। वहाँ स्थित वानर उसे देखकर भयभीत हो काँपने लगे। केवल ज्ञानवान् हनुमान्, अपनी आँखों से अग्नि-कण निकालता हुआ क्रोध-पूर्ण वचन कह उठा कि हे धूर्त्त ! तुम कोई कपटी राक्षस हो, जो मायावेष धारण करके आये हो। मेरे सामने पड़कर अब कैसे बच सकते हो ? और उस (संपाति) के सम्मुख जाकर खड़ा हो गया।
किन्तु, हनुमान् ने उसकी मुखाकृति से पहचान लिया कि यह पापहीन चित्त-वाला है। मन में दुःखी है। वर्षा के समान आँखों से अश्रु बरसा रहा है, अतः निष्कपट है।
उस (संपाति) को आते हुए देखकर सूक्ष्म-शास्त्र ज्ञानवाला हनुमान् खड़ा हुआ। वह अपने मुँह से एक शब्द निकाले, इसके पहले ही संपाति ने प्रश्न किया—किसके लिए अजेय जटायु को किसने बड़ी वीरता से आहत किया ? विस्तार के साथ सारा वृत्तान्त बताओ।
तब हनुमान् ने कहा—यदि तुम अपना यथार्थ परिचय दोगे, तो मैं सब घटनाएँ सविस्तर तुम्हें सुनाऊँगा। तब गृध्रराज अपना वृत्तान्त कहने लगा।
हे विद्युत्-समान दाँतोंवाले ! मैं अभी तक मृत प्राणियों में सम्मिलित नहीं हुआ और फिर भी मेरा भाई मुझसे वियुक्त हो गया है, ऐसा दुर्भाग्य है मेरा। मैं उस (जटायु) का पूर्वज (बड़ा भाई) होकर उत्पन्न हुआ हूँ—यों अपने जीवन के बारे में (संपाति ने) कहा।
उसके कहे वचनों को सुनकर, दोषहीन हनुमान् दुःख के समुद्र में डूबने-उतराने लगा और बोला—वैरी रावण की तलवार से तुम्हारे अनुज की मृत्यु हुई।
हनुमान् का वचन सुनते ही संपाति ऐसे गिरा, जैसे वज्राहत पर्वत ढह गया हो। फिर, उष्ण निःश्वास भरकर व्याकुलप्राण हो निम्नलिखित वचन कहकर रोने लगा—
हे मेरे अनुज ! मेरे दीर्घ पक्ष (सूर्य के ताप से) झुलसकर नष्ट हो गये। पक्ष खोकर बँधे हुए-से पड़े रहने की अपेक्षा प्राण जाना ही उचित था। किन्तु, अविनाशी एक रथवाले (सूर्य) के अति उग्र आतप से भी भयभीत न होनेवाले (हे मेरे अनुज)! यह कैसा आश्चर्य है ? (कि मेरे पहले ही तुम्हारी मृत्यु हो गई।)
कमल में उत्पन्न ब्रह्मदेव स्थिर हैं, धरती और आकाश स्थिर हैं, अविनश्वर धर्म भी अभी बना है, शाश्वत कल्पवृक्ष भी मिटा नहीं है। किन्तु तुम नहीं रहे, यह कैसी दशा है !
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हे वेगवान् गरुड से भी अधिक वेगवाले ! पूर्वकाल मे दो अंडो के एक साथ उत्पन्न होने पर, हम दोनो एक साथ ही जनमे थे, हम दोनो दीर्घकाल तक जीवित रहे । किन्तु, अब मुझे जीवित ही छोड़कर तुम अकेले वीरता-पूर्ण कार्य करके मृत हो गये । यह क्या उचित था ।
हे वीर ! रावण ने, यद्यपि त्रिभुवन में अपने शत्रुओ का वध किया था, तथापि क्या वह तुम्हारे सामने टिक भी सकता था ? उसने तुम्हे मार डाला ? यह कैसा समाचार है !
इस प्रकार कहकर रो-रोकर संपाति अत्यन्त शिथिल पड़ गया और मरणासन्न हो गया । तब अतिबली पर्वत-समान कंधोवाले हनुमान् ने समय के अनुकूल सात्वना के वचन उससे कहे ।
हनुमान् की सांत्वना पाकर सपाति कुछ शान्त हुआ। पूछा—यमतुल्य जटायु ने, उसको मारनेवाले करवालधारी रावण से किस कारण से युद्ध किया ? तब वायु-पुत्र यह वृत्तांत सुनाने लगा ।
हमारे प्रभु की देवी, नीति से अस्खलित शासनवाले ( जनक ) महाराज की पुत्री और उत्तम लक्षणो से पूर्ण सीता, कठोर मायावी के कपट के कारण अपने पति से वियुक्त हो गई ।
धर्म-मार्ग से कभी न हटनेवाले तुम्हारे भाई ने सीता का अपहरण करके ले जाने-वाले राक्षस को देखा और ( रावण से ) यह कहकर कि अमरो से अलंकृत कुंतलोवाली देवी को छोड़कर तुम हट जाओ, बलवान् रथ से युक्त उस रावण के साथ क्रुद्ध होकर युद्ध करने लगा ।
उस सत्यव्रत ( जटायु ) ने उस निष्ठुर पापी के रथ को ध्वस्त कर दिया । उसकी भुजाओ को छिन्न कर डाला । यो धीरे-धीरे जब इस प्रकार उसने उस ( रावण ) की शक्ति को भग्न किया, तब उसने महादेव के द्वारा प्रदत्त करवाल का प्रयोग किया, जिससे जटायु निहत हुआ—यो हनुमान् ने कहा ।
हनुमान् का कथन सुनकर अश्रु-भरित नयनोवाला सपाति, यह कहकर अत्यत प्रसन्न हुआ कि हे सत्यपूर्ण ! निर्मल अंतःकरण से ही जिसकी पवित्र मूर्त्ति जानी जा सकती है, ऐसे प्रभु के निमित्त मेरे भाई ने प्राण छोड़े । यह कार्य उत्तम है ! उत्तम ही है ।
हे वीर ! मेरा भाई, नव-पुष्पधारी हमारे रामचन्द्र की देवी, अरुण चरणोवाली एवं 'वंजी'-लता सदृश सीता की रक्षा के निमित्त अपने प्राण छोडे । अतः, अनन्त कीर्त्ति का भाजन बनकर अमर हो गया । उसे मृत मानना उचित नही है ।
धर्म-रूप प्रभु से प्रेम के साथ बघुत्व स्थापित करके मेरे भाई ने अपनी इच्छा से प्राण-त्याग दिये । ऐसे दुर्लभ पुरुषार्थ से युक्त उस जटायु की मृत्यु से क्या हानि हो सकती है ? इस भाग्य से बढकर सुखदायक वस्तु और क्या हो सकती है ?
वह ( संपाति ) यो अनेक प्रकार से रोता रहा । फिर, शीतल जलाशय मे जाकर अनुपम बलवाले उस सपाति ने स्नान किया । तदनंतर घनी मालाओ से भूषित वानरो के प्रति ये वचन कहे—
किष्किन्धाकाण्ड ५३२
हे वीरो ! तुमलोग बहुश्रुत हो, इसलिए पापहीन हो गये हो । तुमलोग असत्य-रहित भी हो । तुमलोगो ने यहाँ आकर मुझे जीवन ही प्रदान किया । मेरे भाई की मृत्यु का समाचार देकर मुझे दुःख-सागर में नही डुबोया, किन्तु मेरी विपदा ही दूर की ।
हे मधुरभापियो ! सत्य की वृद्धि करने की महिमा से युक्त हे वीरो ! तुम सब उसी राम-नाम का जप करो । वैसा करने पर उस प्रभु की अत्युत्तम करुणा मुझे प्राप्त होगी ।
संपाति ने यों कहा । तब वानर यह सोचकर कि हम इस कथन की परीक्षा करेंगे, वैसे ही खड़े रहकर नीलवर्ण उस प्रभु के हितकारी नाम का उच्चारण करने लगे । तब बलवान् भुजावाले सपाति के पक्ष निकल आये ।
उज्ज्वल शरीरवाला संपाति, सब लोकों मे व्याप्त महाविष्णु ( के अवतार राम ) की कृपा को प्राप्त कर पंखो से युक्त हुआ । उसको पंख क्या मिल गये, मानों धुँआधार अग्नि को उगलनेवाले करवाळ को कोष मिल गया हो ।
सभी वानर, प्रख्यात रामचन्द्र का नाम उच्चारण करने से, पहले लुढ़कते हुए आनेवाले ( संपाति ) का हित होते हुए देखकर विस्मय से भर गये । वे प्रसन्न हुए और स्तब्ध भी हो गये । फिर, देवाधिदेव ( राम ) की प्रशस्ति गाने लगे ।
उन वानरों ने उस ( संपाति ) को नमस्कार किया । फिर, प्रश्न किया कि तुम अपना सारा पूर्व-वृत्तान्त कह सुनाओ । उनका वचन सुनकर संपाति अपने जीवन के बारे में कहने लगा ।
हे मातृ-तुल्य मित्रो ! हम दोनो, ( संपाति और जटायु ) तरंगायमान समुद्र से आवृत धरती के अन्धकार को मिटानेवाले सूर्य के सारथी अरुण के पुत्र होकर जनमे और मनोहर रंगवाले पखों से युक्त अति वेगवाले गिद्धो के राजा बने ।
हम दोनो, स्वर्ग मे स्थित देवलोक का दर्शन करने का विचार करके आकाश मे बहुत ऊपर उड़े, किन्तु उष्णकिरण ( सूर्य ) का रथ देखकर भी पूर्ण रूप से उसे नही देख पाये। तब अग्नि को भी तपानेवाले दिव्य अरुण किरणो से युक्त सूर्य हम पर क्रुद्ध हो उठा ।
ऊपर उड़े हुए मेरे अनुज के शरीर को, सूर्य का आतप अत्युग्र होकर तपाने लगा । तब वह बोला—हे मेरे बड़े भाई ! मुझे बचाओ । तब मैने अपने पक्षों को उस ( जटायु,) पर फैला दिया और वह मेरी छाया में आ गया । मैं मरा तो नही । किंतु मेरे पंख झुलस गये और मै धरती पर आ गिरा ।
मुझ धरती पर गिरे हुए को आकाश मे चमकनेवाले सूर्य ने देखा और अपार करुणा से भर गया । उसने यह कहा कि जनक की प्रिय पुत्री का अपहरण हो जाने पर ( उसका अन्वेषण करते हुए ) आनेवाले वानर जब राम-नाम का उच्चारण करेंगे, तब पहले-जैसे ही तुम्हारे पख निकल आयेंगे ।
जब मेरे पख झुलस गये, तब मैं उष्ण निःश्वास भरता हुआ, लोकसारग नामक महान् तपस्वी के निवासभूत पर्वत के सानु पर आ गिरा । मेरा शरीर और मन शिथिल हो गये थे । पीडा के बढ़ने से प्राणो का भार भी मैं वहन नही कर सकता था । मैंने प्राण-त्याग
५४० कंब रामायण
करने का निश्चय कर लिया। इतने मे अपूर्व तपस्या-सपन्न लोकसारग मुनि नं मेरे सम्मुख आकर मुझे सान्त्वना दी।
(उन्होने कहा—) अशिक्षित मूढजनों के समान मन के (अनुचित) उत्साह के कारण तुमने देवताओ के सुरक्षित लोक में जाने का प्रयत्न किया। तुम्हारे बहुत ऊपर उड़ जाने से तुम्हारे पख झुलस गये और तुम धरती पर आ गिरे हो। अब और कुछ दिनो तक अपने प्राणो को सुरक्षित न रखकर उनको त्यागने की चेष्टा करना उचित नही है। (अर्थात्, सूर्य के कथनानुसार वानरो के आगमन तक तुम्हे प्राण रखे रहना ही उचित है)।
फिर सपाति ने कहा—हे अति वलाढ्य वीरो! उस दिन उन मुनिवर ने करुणा करके मुझसे यह भी कहा था कि जो घमंडी होता है, उसका विनाश निश्चित है। मायावी (रावण) के द्वारा जब सीता हरी जाकर अदृश्य हो जायगी, तब उसका अन्वेषण करते हुए वानर लोग आयेंगे। उनके राम-नाम का उच्चारण करने पर तुम्हारे पख निकल आयेंगे। अतः, तुम दुःखी मत होओ।
हे देवविस्मयकारी कार्य करनेवाले, उत्तम वीरो! मेरे दुःख से दुःखी जटायु, मेरी आज्ञा का भंग करने से डरकर, गगनगामी गिद्धों का राजा बना। यही हमारा वृत्तान्त है। अब तुमलोग इस स्थान पर आने का अपना वृत्तांत भी सुनाओ।
सपाति के यह कहने पर वानरो ने राम के प्रति नमस्कार करके उससे कहा—हे मातृ-तुल्य! नीच कृत्यवाला राक्षस (रावण) दक्षिण दिशा में सीता देवी को ले गया है। यही सोचकर हम उस (देवी) को ढूँढ़ते हुए यहाँ आये हैं। वानरो का यह कथन सुनकर सपाति ने कहा—तुमलोग चिंता मत करो। मैं इस सबंध में तुम्हें कुछ बातें बताऊँगा।
शर्करा-रस के समान मधुर बोलीवाली सीता को जब वह पापी राक्षस ले जा रहा था, तब मैने उसे देखा। वह उसे लंका मे ले गया है। व्याकुल चित्तवाली उस देवी को घोर बंधन मे डाल रखा है। वह देवी अब भी वही है। तुम लोग जाकर देखो।
शब्दायमान समुद्र से आवृत वह लंका यहाँ से सौ योजन पर स्थित है। उस लका पर, कठोर पाश से युक्त यम भी अपनी दृष्टि नही डाल सकता। उस क्षुद्रगुणवाले राक्षस का क्रोध अग्नि को भी शान्त करनेवाली दूसरी अग्नि है। हे दोषरहित एव सद्गुणो से पूर्ण वीरो! तुम्हारे लिए उस लका मे जाना कैसे सभव होगा?—यो सपाति ने पूछा।
आगे उसने कहा—चतुर्मुख और अर्द्धनारीश्वर की बात तो दूर, क्षीर-समुद्र मे शेषनाग पर शयन करनेवाला विष्णु भी हो और यम भी हो, तो उनके लिए भी विशाल समुद्र के पार-स्थित उस लंका मे प्रवेश करना असभव है। हे चिरजीवियो! भावी कार्यों के परिणामो को सोचकर आगे बढ़ो।
उस प्राचीन (लका) नगरी मे तुम सबका प्रवेश करना असभव है। यदि किसी मे सामर्थ्य हो, तो वह अकेले वहाँ जाय। अदृश्य रूप में, वहाँ रहकर सीता देवी को (प्रभु का दिया हुआ) संदेश देकर उसके दुःख को शांत करे और लौट आये। यदि ऐसा सामर्थ्य तुममें से किसी में नही है, तो मेरी बात पर विश्वास करो और रामचन्द्र के पास जाकर उन्हें समाचार दो।
किष्किन्धाकाण्ड ५४१
शासक के न होने से सारा गृध्र-समाज अपने आवास को छोड़कर बिखर जायगा। उस दुर्दशा को रोकने के लिए मुझे शीघ्र जाना आवश्यक है। हे मित्रो ! जिसमें हित हो, वही कार्य करो ।—यों कहकर संपाति अपने पंखों से आकाश को ढकता हुआ उड़ चला। ( १--६६ )
अध्याय १६
महेन्द्र-शैल पटल
कुछ वानर, यह निश्चय कर कि गृध्रराज झूठ बोलनेवाला नहीं है, अन्य वानरों से कहने लगे—कर्त्तव्य को शीघ्र संपन्न करनेवाले हे वीरो ! हमने ( सीता के समाचार को ) हाथ के आँवले के समान पूरा जान लिया है। जीवन देनेवाला एक वचन हमने सुन लिया। अब कर्त्तव्य का ठीक-ठीक विचार करके कुछ करो।
यदि हम सूर्य्यपुत्र और उज्ज्वल धनुष को धारण करनेवाले को नमस्कार करके सारा वृत्तांत उन्हें सुना दें, तो हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जायगा। फिर, भी वीरता का कार्य तो यही होगा कि हम स्वयं समुद्र को पार कर सीता के दर्शन करें। हममें से समुद्र को पार करने का सामर्थ्य रखनेवाला कौन है ?—यों परस्पर प्रश्न कर वे एक-एक करके अपनी-अपनी शक्ति का वर्णन करने लगे।
पहले हमने मरने का साहस किया। सदा अमिट रहनेवाले अपयश को लेकर लौटने का भी साहस किया। अब उन दोनों कार्यों से छुटकारा पाने का एक अच्छा मार्ग ( संपाति के द्वारा ) हमने प्राप्त किया है। अब समुद्र को पार कर काले राक्षसों को मिटाने का सामर्थ्य रखनेवालो ! हमारे प्राणों को बचाओ।
युद्ध में विजय से भूषित होनेवाले नील आदि उत्तम वीरों ने, समुद्र पार करने की अपनी असमर्थता को स्पष्ट कह दिया। वीरता से पूर्ण युद्ध में विजयी वाली-पुत्र ने कहा—मैं समुद्र के उस पार तो जा सकता हूँ, किंतु लौट आने की शक्ति मुझमें नहीं है।
चतुर्मुख ( ब्रह्मा ) के पुत्र ( जाम्बवान् ) ने कहा—हे भुजबल से पूर्ण वीरो ! वेदों के लिए भी दुर्जय भगवान् ( विष्णु ), सारी धरती को एक ही पग से नापने लगा था। उस समय, मैं आठों दिशाओं में उस ( त्रिविक्रम ) की परिक्रमा करता हुआ गया और ( उस भगवान् के अवतार होने की ) घोषणा करता हुआ घूमने लगा था। मेरु के आघात से मेरे पैर दुखने लगे थे। अतः अब इस महान् समुद्र पर उछलकर जाने और लंका की परिखा के पार बने हुए प्राचीर पर कूदने और उस नगर के राक्षसों को भयभीत कर सीता का अन्वेषण करने की शक्ति मुझमें नहीं रह गई है।
| ५४२ | कंब रामायण |
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फिर, ब्रह्मपुत्र जांबवान् ने अंगद से कहा—वानर-वीरो मे उत्तम सिंह-सदृश हे कुमार ! हम अब अत्यन्त दुःखी होकर किसके पास जाकर प्रार्थना करें कि तुम समुद्र के पार जाओ । ऐसा विचार करने से भी तो हमारा यश मिटता है ।
अब हमारे यश को सुरक्षित रखनेवाला वह मारुति ही है, जिसने पूर्व मे रामचन्द्र के सम्मुख जाकर (सुग्रीव को) उनका सखा बनाया था । वही (मारुति) कर्त्तव्य का ठीक-ठीक विचार करके उसे पूरा करने का सामर्थ्य रखता है । उसकी समानता करनेवाला और कोई नही है । इस प्रकार कहकर फिर, जाबवान् हनुमान् के भुजबल की प्रशंसा करते हुए ये वचन कहने लगा ।
(जांबवान् हनुमान् को देखकर कहने लगा—) ब्रह्मदेव भी मर सकता है, किन्तु तुम्हारी मृत्यु कभी नही होगी । तुमने सर्वशास्त्रो का गहन अध्ययन किया है । विषयो का ठीक-ठीक प्रतिपादन करने की शक्ति भी तुममे है। तुम्हारे वल और क्रोध को देखकर काल भी काँप उठता है। तुममें कर्त्तव्य कर्म करने की दृढता है। विष का पान करनेवाले शिवजी के समान ही तुममें घोर युद्ध करने की शक्ति भी विद्यमान है।
अत्युष्ण रक्तवर्ण अग्नि से, जल से तथा वायु से भी तुम मरनेवाले नही हो । अनेक-विध प्रसिद्ध दिव्य आयुधो से भी तुम्हारा विनाश नही हो सकता । तुम्हारा उपमान कुछ बताना हो, तो केवल तुम्ही अपने उपमान हो । एक बार कूदो, तो तुम इस ब्रह्मांड से परे भी जा पहुँचोगे ।
अच्छे गुणों को ही नही, बुरे गुणो को भी पहचान कर स्पष्ट कहने की सामर्थ्य तुममें है। स्वय ही कर्त्तव्य को जानकर उसे पूर्ण करने की शक्ति तुममें है। तुम (शत्रुओ पर) विजय पा सकते हो । (लका में जाकर) लौट आने की शक्ति भी तुम रखते हो । यदि वे अपना बल दिखावें, तो उन्हें मारने की शक्ति भी तुममें है। तुम्हारा भुजबल कभी घटता नही ।
तुम्हारी महिमा मेरु से भी ऊँची है। मेघ से बरसनेवाले जल की बूँद में भी प्रवेश कर जाने की शक्ति तुममें है। धरती को भी उठा लेने का बल तुममें है। कोई भी पाप-भावना तुममें नही है। तुम्हारी ऐसी शक्ति है कि सूर्य को भी अपने सुन्दर करों से छू सकते हो ।
तुमने उचित उपायो को ठीक-ठीक सोचकर, धर्म का नाश किये बिना, युद्ध-कुशल वाली का वध करवाया । तुम्हारा बुद्धि-कौशल ऐसा है। प्रसिद्ध देवेन्द्र ने जब वज्र से तुम पर आघात किया था, तब तुम्हारा एक छोटा-सा रोया भी टूटकर नही गिरा।
तुम्हारी भुजाओ में ऐसी शक्ति है कि यदि तीनो लोक भी तुम्हारा सामना करने आयें, तो उन भुजाओ के लिए त्रिभुवन की वस्तुएँ भी कुछ चीज नही होगी । धरती के अंधकार को मिटानेवाले सूर्य के निकट, उसके रथ के आगे-आगे चलते हुए, तुमने सस्कृत (के व्याकरण) का ज्ञान प्राप्त किया था ।
तुम नीति में स्थिर हो, सत्य-पूर्ण हो, मन में कभी स्त्री-संगति का विचार
किष्किन्धाकाण्ड ५४३
तक नहीं लाते। सब वेदों का अध्ययन किया है। ब्रह्मा की आयु से भी अधिक आयु-वाले हो। तुम भी ब्रह्माओं में से एक कहलाते हो।
उस महिमामय प्रभु (राम) की भक्ति से युक्त हो। अपने कर्त्तव्य का पूर्ण ज्ञान रखते हो। तुमने अपने ऊपर (सीता का अन्वेषण करने का) दायित्व लिया है। बिना किसी बाधा के उसे पूर्ण करने का सामर्थ्य भी तुममें है। तुमने अपने मन में दृढ़ रूप से यह स्थापित कर लिया है कि एकमात्र पुण्य ही सदा स्थिर रहनेवाला है।
समय अनुकूल न होने पर तुम दबकर रह सकते हो। यदि युद्ध छिड़ जाय, तो उसमें सिंह के समान शक्तिमान् हो सकते हो। सोच-विचार करके जो कार्य आरंभ किया हो, केवल उसी को नहीं, किंतु, किसी भी कार्य को पूर्ण करने की शक्ति तुममें है। कठिन बाधाएँ उत्पन्न होने पर भी तुम पीछे हटनेवाले नहीं हो।
विजयशील इन्द्र से लेकर, सब व्यक्ति तुम्हारे चारित्र्य को ही आदर्श मानकर चलते हैं। तुम अत्यन्त सहनशील हो। अतः, सब कार्यों को ठीक ढंग से सोचकर करने का सामर्थ्य तुममें है। सभी इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करने की शक्ति भी तुममें है।
तुम्हीं इस समुद्र को पार करने की शक्ति रखते हो। अतः, यहाँ से शीघ्र जाओ और हम सबको जीवन देकर यश प्राप्त करो। इससे तुम्हारी माता-तुल्य सीता देवी भी प्रसन्न होंगी और विपदा-रूपी अपार सागर को पार कर सकेंगी—इस प्रकार ब्रह्मपुत्र (जांबवान्) ने कहा।
जांबवान् ने जब ऐसा कहा, तब अत्यन्त ज्ञानवान् हनुमान् के दीन मुख पर मंदहास इस प्रकार विकसित हुआ, जिस प्रकार कमलपुष्प के मध्य रक्तकुमुद विकसित हो उठा हो। उसके कमल-जैसे कर मुकुलित हो गये। सब वानरों के आनंदित होते हुए, उसने अपने भावों को इन शब्दों में प्रकट किया—
तुम लोग ऐसे हो कि कुछ सोचने के पूर्व ही, ऊँची तरंगों से पूर्ण सातों समुद्रों को पार कर सकते हो, सब लोकों को जीत सकते हो और सीता देवी का अन्वेषण करके उन्हें ला सकते हो। ऐसा होने पर भी मुझ ज्ञानहीन की लघुता को प्रकट करने के लिए ही तुमने मुझे यह आदेश दिया है। अब मेरे समान भाग्यवान् और कौन होगा?
यदि तुम लोग कहोगे कि लंकापुरी को उखाड़कर ले आओ, या यदि कहोगे कि लोक-कंटक राक्षसों को मिटाकर, स्वर्णमय ताटंकधारिणी कलापी-तुल्य सीता को ले आओ, तो मैं तुम्हारे आदेश के अनुसार ही वह कार्य करूँगा। शीघ्र ही तुम अपनी आँखों से देखोगे।
जिस प्रकार विष्णु भगवान् ने धरती को नापा था, उसी प्रकार एक शतयोजन को एक पग में समाता हुआ मैं इस विशाल समुद्र को पार करूँगा। यदि इन्द्र आदि देवता भी आकर (रावण की ओर से) मेरे साथ युद्ध करेंगे, तो भी लंका में निवास करनेवाले सब राक्षसों का विनाश करके अपने कार्य को मैं अवश्य पूरा करूँगा।
यदि समुद्र उमड़कर सारी धरती को डुबोने लगे, या यह सारा ब्रह्मांड ही टूटकर अंतरिक्ष में उड़ जाय, तो भी मैं, मेरे प्रति दिखाई गई तुम्हारी कृपा और प्रभु की आज्ञा इन