भारतकोश
कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary

कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished354 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

॥श्री॥ संवत १६७० वर्षे माह सुदि १५ गुरौ वासरे लिखितं दलपतेन वा रिणंक ! निषिद्धे किमपि न वाच्यं सुकवि कया एहि आं जो हु रंग उउ वत्र मण म ! राउल कउ म्हारो दीना मांपूंछना उमति आप्णाउजवी कारि तिने दूत नी वर्षावा ॥७५॥ एकि विव्वे गने र म्योउ सिंह ते दूत णां प्रविसि कुंत र ग्हिया ते फु ल कूद दंत णं नत दर्दै ॥ उक्तं ॥ प्रत्पवदन व नव सा णा उिक ऽफल क ड त प या छि थ्या ॥ उफु ल कुदृ दंतं णं नत दर्दै ॥ अकलंकु दृष्टे दीठो थि वी ज कुल कामिणी ध्यानि गते यु उलह उ हे रि प्राण । एतानि कुल पति सिंगांग धारि, ३ कुल उहटे टिकदेदां तां उ फल क ड पविद्यू घउ ऽ ती तैपं कले दिदृगो घवसी ॥२५॥ उतिकुंल णात्य गारी विने घिवा उ० वा दिउ ऽ कुलितिनि ऽङि• काह्य मरुद्दी तिने उ उ मा दुमा थण मनां मूंकौ हुं • लहि डा गिका को छम्मा बा उि फुल ऽछह्या रिपुया ता ळणा गमन नाम उ०, रिपु न्याति विस्कुल ककि रिह दि न उ सात्रि ॥ का ऽक वित्रिनि ऽके न गते दृष्टाहं ॥ कवि त्रि त्रिके नर यू लि ल घा नी रा थानि थ्यो स्यात तली । पाति डलप थ्र वे वि तलां २॥ उलियां मति का ऽउ न मत्रि ब्रिश्रुतियं नायुम नो रथ प्रां क्लि इ प्राऽस्तन वे ध कव्य त मति घारी कलि बुद्धि क ध अउ तय विष्य सां वाल्या पा क उलियक्रिनिकुली ! शृंग प्रा ऽक द्विक्कतं णा पद्म नान मति विरचितं तणं । आश्वशारितुरिंग ऽकुं हत णां चतुर्थः खण्डः ॥ ॥शुभं भवतु॥