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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पाँचवाँ अध्याय

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ग्रास ऐसा है जो दूसरों के मुख से छीना जाता है। हमारा जीना दूसरों के जीवन को नष्ट करनेवाला है। यह भगवद्गीता का सिद्धान्त है। चाहे मनुष्य हो या पशु पक्षी, या कीड़े मकोड़े हों, इनमें से किसी न किसी को मरना अवश्य है। जब यह बात है तो किसी को हानि न पहुँचानेवाला सिद्धान्त किसी कर्म से सिद्ध नहीं हो सकता। तो अब अच्छे-बुरे की कसौटी क्या रही ? यही कि जिस काम में लाभ अधिक है, हानि कम, वह अच्छा है और जिसमें हानि अधिक लाभ कम है, वही बुरा है।

दूसरी विचारणीय बात यह है कि कर्म का अन्तिम परिणाम क्या है ? प्रत्येक देश के निवासी विश्वास रखते हैं कि एक ऐसा समय आवेगा, जब यह सृष्टि स्वर्ग-धाम बन जावेगी। तब रोग, मृत्यु, दुःख और पाप नाम को भी न रहेंगे। यह बात सुनने में बहुत अच्छी मालूम होती है, भाव भी अच्छा है और इससे मूर्खों को धर्म के लिए कुछ प्रेरणा भी होती है। परन्तु ज़रा सोचने से पता लग जायगा कि ऐसा कभी हो नहीं सकता। जब कि पाप और पुण्य एक ही माता (सृष्टि) के गर्भ से दो यमल (जोड़ुवाँ) पुत्र उत्पन्न हुए हैं तब यह क्योंकर सम्भव है कि हम एक ही समय में कोई ऐसा काम कर सकते हैं, जिसमें पाप और पुण्य दोनों मिश्रित न हों। पूर्णता से तुम्हारा क्या अभिप्राय है ? निर्दोष जीवन का होना असम्भव है। क्योंकि जीवन वास्तव में उस संग्राम का नाम है जो हमारी आन्तरिक और वाह्य वृत्तियों में हो रहा है और यदि हम इस संग्राम में परास्त हो जावें तो फिर जीवन समाप्त हो जाता है। हमारे आध्यात्मिक और शारीरिक सम्बन्ध का ही नाम