कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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कर्मयोग
जीवन है। वह कोई पृथक् या स्वतंत्र वस्तु नहीं है। किन्तु मानसिक वा शारीरिक चेष्टाओं का मिश्रित परिणाम है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि जब यह झगड़े न रहेंगे, तब जीवन भी न रहेगा।
पूर्ण आनन्द और निराबाध सुख का (जो मुक्ति में प्राप्त होता है) आशय कुछ और है। जब वह अवस्था आ जायगी, तब यह संग्राम बन्द हो जायगा। परन्तु उस समय यह जीवन ही न रहेगा। जब तक जीवन है, न तो संसार के झगड़े शान्त होंगे और न उस अवस्था की प्राप्ति हो सकती है। जिस समय हम उस आनन्द का हज़ारवाँ भाग भी प्राप्त कर लेंगे, यह संसार बिलकुल शान्त हो जायगा और हमारा नाम या चिह्न तक शेष न रहेगा। किन्तु इस संसार में इस पूर्णानन्द की आशा करना व्यर्थ है। हम पहले कह चुके हैं कि इस संसार की सहायता करने में हम अपनी सहायता आप करते हैं। कर्म करने का मुख्य तात्पर्य यह है कि हम अपने आप को पवित्र बना लेते हैं। दूसरों की भलाई की चेष्टा में हम अपने आप को भूल जाते हैं। यही सच्चा त्याग है, जो हमको अपने जीवन में सीखना है। मनुष्य मूर्खता से समझता है कि मैं अपने आपको प्रसन्न कर सकता हूँ। परन्तु वर्षों के लगातार आन्दोलन से उसकी आँख खुल जाती है और वह समझने लगता है कि सच्ची प्रसन्नता स्वार्थ के नाश में है। निःस्वार्थ होकर ही हम अपने को शान्त और प्रसन्न कर सकते हैं। उदारता, संवेदना और सहानुभूति के पवित्र भाव ही हमारी स्वार्थ-बुद्धि को कम करते हैं। लोभी, कृपण और निर्दय ही अधिक स्वार्थी होते हैं। स्वार्थ का नाश ही सच्चा त्याग है। यहाँ आकर