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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पाँचवाँ अध्याय ६५

ही हमको विदित होता है कि भक्ति, ज्ञान और कर्म इन तीनों का उद्देश एक ही है। भक्ति और कर्म मिल कर ही ज्ञान को उत्पन्न करते हैं। ज्ञान का उदय होते ही "मैं" का आवरण उठ जाता है और केवल "तू ही तू" दिखाई देता है। मनुष्य चाहे इस रहस्य को समझे या न समझे, पर कर्म-योग उसे इस पदवी तक पहुँचा ही देता है। धार्मिक उपदेशक अमूर्त्त या अव्यक्त ईश्वर का नाम सुन कर सम्भव है कि चौंक पड़ें, किन्तु वे अपने आस्तिक होने का घमण्ड रखते हैं ! उनका चरित्र चाहे कैसा ही अच्छा हो, पर उनमें पूर्ण वैराग्य और सच्चा त्याग कभी उत्पन्न हो नहीं सकता। त्याग ही सदाचार का मूल है। बिना त्याग के यदि सदाचार हुआ भी तो कभी कभी वह अत्याचार के रूप में परिणत हो जाता है।

इस संसार में भिन्न भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं। प्रथम ईश्वर कोटि वाले मनुष्य हैं, जिनमें पूर्ण वैराग्य है और जो नाना भाँति के कष्ट उठा कर यहाँ तक कि अपने प्राण-पण से भी दूसरों का उपकार करते हैं। जिनका कोई स्वार्थ होता ही नहीं और यदि होता भी है तो वह यही कि दूसरों का भला करना। ऐसे मनुष्य उच्च-कोटि के होते हैं। यदि किसी देश में ऐसे श्रेष्ठ व उदार मनुष्य सौ भी हों तो उसको निराश होने का कोई कारण नहीं है। परन्तु शोक है कि संसार में ऐसे मनुष्य बहुत ही कम होते हैं। दूसरे वे सज्जन मनुष्य हैं, जो उस समय तक परोपकार करते रहते हैं जब तक उनके स्वार्थ में बाधा नहीं पड़ती। ऐसे मनुष्यों की गणना मध्यम कोटि में है। तीसरी श्रेणी में उन कुटिल स्वभाव वाले मनुष्यों की