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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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भी था। उसके पिता और पितामह ने बहुत कुछ यत्न किया कि वह ज्ञानी वा तत्वदर्शी बन जावे, पर सफलता नहीं हुई। किन्तु उसका पुत्र शुकदेव पूर्ण ज्ञानी तथा आत्मदर्शी हुआ। व्यास ने अपने पुत्र को ज्ञान सीखने के लिए राजा जनक के पास भेजा। जनक "विदेह" कहलाता था। 'विदेह' शब्द का अर्थ यह नहीं है कि जिसका देह न हो, किन्तु देह की ममता जिसको न हो उस को विदेह कहते हैं। वह एक राजा होने पर भी राज्य को क्या शरीर को भी अपना नहीं समझता था। शुकदेव बालरूपन में ही शिक्षा पाने के लिए उसके पास आया। राजा को मालूम हो गया कि व्यास-पुत्र उसके पास ज्ञान सीखने के लिए आ रहा है। इसलिए उसने पहले से ही कुछ प्रबन्ध कर रक्खा था। जब शुकदेव राजप्रासाद के द्वार पर पहुँचा तब द्वारपालों ने उसको बैठने के लिए जगह तो दे दी, पर किसी ने उसकी बात नहीं पूछी। तीन दिन, तीन रात तक वह वहीं बैठा रहा, किसी ने उससे कुछ न पूछा। तीन दिन के पश्चात् राजा के मंत्री उसके पास आये और बड़े आदर व सम्मान से उसको रत्नजटित घरों में ले गये। वहाँ सुगन्धित जल से स्नान कराया, उत्तम वस्त्र पहनाये और सब ऐश्वर्य के सामान उसके लिए उपस्थित कर दिये। आठ दिन तक इसी प्रकार उसकी परिचर्या की गई, परन्तु इन सब क्रियाओं का उसके मन पर कुछ भी प्रभाव न हुआ। न वह अपमान से क्रुद्ध हुआ था और न मान से प्रसन्न। दोनों दशाओं में वह निरीह निःस्पृह पाया गया। इसके पश्चात् वह राजा जनक के सामने लाया गया। राजा ने उसके हाथ में एक दूध का भरा हुआ पात्र दिया और