कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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कर्मयोग
कहा कि इस मंदिर की सात परिक्रमा करो, पर सावधान रहो कि दूध की एक बूँद न गिरने पावे। लड़के ने प्याला हाथ में लिया। यद्यपि वहाँ नृत्य-गान और अनेक भाँति के क्रीड़ा-कौतुक हो रहे थे, परन्तु लड़के का ध्यान अपने काम पर रहा। वह राजा के आज्ञानुसार सात बार परिक्रमा दे आया और एक बूँद भी प्याले में से न गिरी। जब वह अपना काम समाप्त करके राजा के पास पहुँचा तब राजा ने कहा,—जो कुछ शिक्षा तेरे पिता ने तुझको दी है, वह ठीक है। मैं भी केवल उसी का अनुवचन कर सकता हूँ; इसलिए तू घर जा, तू पूर्ण ज्ञानी है और तेरे हृदय में विवेक का दीपक जल रहा है।
शुकदेव अपने मन को यहाँ तक वश में किये हुए था कि किसी प्रकार के बाह्य दर्शन या प्रलोभन उसको अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकते थे। ऐसे मनुष्य को कोई बन्धन में नहीं डाल सकता। वह जहाँ भी रहे, जो कुछ भी करे, सब से निर्लेप है।
संसार के विषय में मनुष्यों के दो प्रकार के मत हैं। किन्हीं लोगों का मत है कि संसार बड़ा भयानक और दुःखमय है। दूसरे कहते हैं, संसार बड़ा रमणीय और सुख का स्थान है। जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियों को वश में नहीं किया, उनके लिए यह संसार वास्तव में भयानक है और जिन लोगों ने आत्म-संयम-रूप शस्त्र से इस दुर्जय मन को जीत लिया है, उनके लिए यह संसार एक विचित्र और सुन्दर अद्भुतालय है। जैसे अजायबखाने की वस्तुओं के बनने और बिगड़ने का दर्शक पर कुछ प्रभाव नहीं