कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय
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पड़ता, ऐसे ही इस संसार की वस्तुओं के बनने और बिगड़ने का उस मनुष्य पर, कि जिसने अपने मन को जीत लिया है, कुछ प्रभाव नहीं पड़ता। प्रत्येक वस्तु अपने अवसर और स्थान पर अच्छी और शोभित मालूम पड़ती है। जो लोग संसार को भयानक या नरक बतलाते हैं, जब वह मन को जीत कर आत्मशासन में प्रवेश करते हैं, तो यही संसार उनको स्वर्ग से भी अधिक सुखदायक मालूम पड़ता है। कर्मयोग बातों से नहीं प्राप्त होता, किन्तु अभ्यास से सिद्ध होता है। जब हम निष्काम होकर इसका आरम्भ करते हैं तब थोड़े ही दिनों में यह अपना फल दिखाता है और हम में त्याग और वैराग्य के संस्कार प्रबल होने लगते हैं जो अभिमान, स्वार्थ और ममत्व के संस्कारों को प्रथम मन्द और अन्त में जाकर निर्मूल कर देते हैं। तब यह संसार हमारे लिए शान्ति-धाम बन जाता है और चारों ओर हमको आनन्द ही आनन्द दीख पड़ता है। यह कर्मयोग का वास्तविक परिणाम है।
योग अनेक प्रकार के हैं, परन्तु उनमें परस्पर विरोध नहीं है, सबका अन्तिम उद्देश एक ही है। यदि हम विश्वास और अभ्यास से काम लें तो सब हमको एक ही अभीष्ट स्थान पर पहुँचाते हैं। सारी शक्ति अभ्यास में छिपी हुई है। पहले सुनो, फिर मनन करो, तत्पश्चात् कर्म करो; प्रत्येक प्रकार का योग यही शिक्षा देता है। पहले श्रवण, मनन और निदिध्यासन हैं, इन्हीं को ज्ञान का साधन भी कहते हैं। तत्पश्चात् साक्षात्कार है, इसी को ज्ञान का फल भी कहते हैं। प्रत्येक वस्तु का ज्ञाता और व्याख्याता तुम्हारा आत्मा है। यथार्थ में तुम अपने शिक्षक आप ही हो। बाह्य गुरु या उप-
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