कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय
मुक्ति
कर्म का फल भी कर्म ही कहलाता है। मन, वचन और कर्म से जो फल उत्पन्न होता है, वह भी काल पांकर कर्म-चक्र में सम्मिलित हो जाता है। इस प्रकार कर्म से फल और फल से कर्म का चक्र संसार में सदा चलता रहता है। वस्तुतः कर्म में कार्य्य-कारण-भाव दोनों रहते हैं। जहाँ कोई कार्य होगा वहाँ उसका कारण अवश्य होगा, चाहे वह गुप्त हो। इसी प्रकार कारण की उपस्थिति में कार्य्य भी बिना हुए न रहेगा, चाहे अभी न हुआ हो। यह कर्म का सिद्धान्त, जिसको हमारा शास्त्र बतलाता है, संसार भर में सच्चा माना गया है। जो कुछ हम देखते, छूते या करते हैं, वह कर्म है। जहाँ उससे कुछ फल उत्पन्न होते हैं, वहाँ उन फलों के सम्बन्ध में बहुत से नये कर्म भी बन जाते हैं। जहाँ कहीं एक कर्म हो रहा है वहाँ उसके सम्बन्ध में अनेक कर्मों का बार बार होना आवश्यक और प्रत्यक्ष है। नैयायिक (तार्किक) लोगों ने इसके लिए एक विशेष परिभाषा "व्याप्ति" नियत कर ली है। उनके मतानुसार इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में हमारे संपूर्ण मानसिक, वाचिक और कायिक कर्मों में व्याप्ति काम कर रही है। मन में एक विशेष प्रकार का सङ्कल्प उठते ही हम देखते हैं कि उससे सम्बन्ध रखनेवाले और अनेक प्रकार के भाव तरङ्गों के