कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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सारें स्थान हमारे सीमाबद्ध संसार में होंगे और देश, काल और निमित्त से घिरे हुए होंगे । यह सम्भव है कि आकाश-मण्डल में ऐसे अगणित लोक या स्थान हों, जहाँ अत्यन्त सूक्ष्म सृष्टि बसती हो और वहाँ के भोग-विलास और सुख-साधन यहाँ की अपेक्षा उत्तम हों। परन्तु ये लोक और स्थान भी इसी संसार के अन्तर्गत हैं और इसलिए बन्धन के नियम से मुक्त नहीं हो सकते । मुमुक्षु को इनसे भी परे जाना होगा। जहाँ यह संसार समाप्त होगा वहीं से, उस परम पद का आरम्भ होता है । ये सुख-दुःख और हर्ष-शोक और इनका संवेदन सब यहीं समाप्त हो जाता है । वहाँ केवल आत्म-दर्शन और तज्जनित आनन्द शेष रहता है । जब तक हम इस परिवर्त्तन-शील और क्षण-भङ्गुर जगत् से बेलाग नहीं होते और जब तक तृष्णा की तरङ्गें हमें मोह के समुद्र में बहाये लिये जा रही हैं, तब तक हम मुक्ति के अधिकारी नहीं बन सकते और न शान्ति के तट पर पहुँच सकते हैं। केवल विवेक का पोत (जहाज़) ही हमको इस दुस्तर समुद्र के पार लगा सकता है । विवेक हमको बतलाता है कि उस परम स्वाधीनता (मुक्ति) के प्राप्त करने का (जो मनुष्य-जीवन का उद्देश है) केवल एक ही उपाय है और वह यह है कि इस असार जीवन का मोह त्याग दिया जावे । स्वर्ग, नरक, शरीर, मन और इन्द्रिय इन सब से विरक्ति स्वीकार कर ली जाय । क्योंकि वे सब परिमित और क्षणिक हैं। बन्धन से छुटकारा पाने के लिए आवश्यक है कि कार्य-कारण और उनके नियमों की सीमा से हम बाहर हो जावें ।
परन्तु इस संसार का छोड़ना बहुत कठिन काम है । विरले