कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मयोग ८३
ही मनुष्य इस योग्य हो सकते हैं। हमारे शास्त्रों में इसके दो साधन बतलाये गये हैं। एक को "नेति, नेति" "यह नहीं, यह नहीं" कहते हैं। दूसरे को "इति, इति" "यह है, यह है" कहते हैं। पहला निवृत्ति-मार्ग और दूसरा प्रवृत्ति-मार्ग कहलाता है। इनमें से पहला अत्यन्त कठिन है। उसकी केवल वेही मनुष्य साधना कर सकते हैं, जिन्होंने अपने इन्द्रिय और मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करके संसार और उसके विषयों को विषवत् त्याग दिया है; सांसारिक कोई इच्छा या आशा कभी जिनको अपने उद्देश से विचलित नहीं कर सकती। परन्तु ऐसे मनुष्य विरले ही होते हैं। साधारण मनुष्यों को दूसरे मार्ग का अनुसरण करना पड़ता है। यह मार्ग पहले की अपेक्षा सरल है। इसमें वे संसार के समस्त बन्धनों में रहते हुए और अपने कर्तव्य-कर्म का आचरण करते हुए अन्त में जाकर उन सबको छिन्न भिन्न कर डालते हैं। यह भी एक प्रकार का तप है। भेद केवल इतना है कि यह काम क्रमशः और शनैः शनैः होता है। इसमें मनुष्य क्रमशः अपना अनुभव और अभ्यास बढ़ाते हुए, त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और काम से लाभ उठाते हुए, सत्यासत्य, हिताहित और कर्माकर्म का विवेक प्राप्त करते हुए अन्त में जाकर निष्काम बन जाता है और मुक्त हो जाता है। निवृत्ति-मार्ग वाले केवल ज्ञान की सहायता से अपना काम करते हैं। वे अपने उद्देश की सिद्धि में कर्म का सहारा लेना नहीं चाहते। इसी को सांख्य और वेदान्त की परिभाषा में "ज्ञानयोग" कहते हैं। प्रवृत्ति-मार्गवाले कर्म की नींव पर अपना मन्दिर निर्माण करते हैं। उनकी दृष्टि में बिना कर्म के