भारतकोश
कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Karpuramanjari Sattaka of Rajasekhara with Commentary

महाकवि राजशेखर द्वारा

DevanagariHindipublished172 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 172 में से

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पृष्ठ 64

५६ कर्पूरमञ्जरी विचक्षणा— तीए णिअंबफलए णिवेसिया पोमराअमणिकंची। राजा— कंचणसेलसिलाए घरिही ता कारिओ णट्टं॥ १५॥ विचक्षणा— दिण्णा घलआवलीउ करकमलपओट्ठणालजुअलम्मि। राजा— ता भण किं ण रेहइ विपरीअं मयणतोणीरं॥ १६॥ विचक्षणा— कंठम्मि तीअ ठविदो छम्मासिअमोत्तिआण वरहारो। राजा— सेवइ ता पंतीहिं मुहचंदं तारआणिकरो॥ १७॥ ———————————————————————————————— विचक्षणा— तस्या नितम्बफलके निवेशिता पद्मरागमणिकाञ्ची। राजा— काञ्चनशैलशिलायां तदर्हा कारितो नृत्यम्॥ अनेन नितम्बस्य पीवरत्वेन काञ्चनशिलासाम्यं काञ्च्याश्च बर्हिसाम्यं प्रकाशितम्। विचक्षणा— दत्ता वलयावलयः करकमलप्रकोष्ठनालयुगे। राजा— तद्वद किं न शोभते विपरीतं मदनतूणीरम्॥ विचक्षणा— कण्ठे तस्याः स्थापितः षाण्मासिकमौक्तिकानां वरहारः। राजा— सेवते तत्पङ्क्तिभिर्मुखचन्द्रं तारानिकरः॥

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