भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृत धारा हो ।

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥

कह रहे हैं कि हे हंस ! इस संसार को छोड़ो और हमारे सत्यलोक में चलो। यह संसार तो काल - पुरुष का देश है, जहाँ कर्म का जाल फैला हुआ है। यह काल-पुरुष सबको मार-मारकर बुरा हाल कर रहा है । त्रिदेव आदि भी यहाँ शरीर धारण कर रहे हैं। वो सुर, नर, मुनि आदि सबको धोखा दे रहा है और चौरासी में डाल रहा है। वो स्वयं तो आकाश में ज्योति-स्वरूप होकर बैठा हुआ है । वहाँ करोड़ों सूर्यों का प्रकाश है। पर उससे परे एक देश है। वहाँ अमृत-धारा बह रही है। वहाँ करोड़ों चाँद और सूर्य एक रोम के प्रकाश से लजा जाते हैं। हे धर्मदास ! परम-पुरुष के उस दरबार को देखो। यह संसार काल-पुरुष का देश है । यहाँ पर कुछ भी आत्मा के हित में नहीं है। वो सबको यहाँ पर दुख दे रहा है। लोग अवतारों की महिमा गाते हैं, पर साहिब कह रहे हैं कि वो भी उसी की सीमा में हैं। तीन-लोक में जो भी , सब काल के दायरे में है । यह हरदो यहाँ काल पुरुष के है हिजारे । हर सिम्त व हर जाय में यम जाल

पसारे ॥

यक लोक व यक वेद दो दरिया के किनारे | सैयाद के काबू में हैं सब जीव

बेचारे ॥

चलती है यहाँ तेग व तलवार दोधारे । चल हंस अचल मोलिदो

मावाय हमारे ॥

कह रहे हैं कि यहाँ सब काल का ही है। हर शै में उसका जाल फैला हुआ है। दुनिया के सब लोग उस क्रूर के काबू में हैं। इसलिए हे हंस ! तू हमारे देश में चल । आगे कह रहे हैं- जब भूल गया आदम को आपही आपा । पावन्द हुवा तिफली जवानी व

बुढ़ापा ॥

सबपर है लगा मलिक मौत मोह व छापा । है आग लगी बेश: जलेगा यह

सरापा ॥

जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरीरे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय

हमारे ॥