भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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जाने पर मूल - सुरति लोक है । यहीं से चेतना आई है। सुरति लोक से फिर तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर अंकुर लोक होता है । उसके ऊपर फिर इच्छा लोक, फिर वाणी लोक, जहाँ से अनहद धुनें भी आती हैं। अंत में फिर सहज लोक है। ये सात लोक सात आकाश भी कहलाते हैं। सहज लोक अर्थात सातवें आकाश तक भी प्रलय है। इन लोकों से ऊपर अर्थात सहज लोक से एक असंख्य योजन ऊपर जाने पर अमर लोक आता है। यही वो स्थान है, जहाँ कभी नाश नहीं है । यह तीन लोक तो नष्ट हो जाता है, पर वहाँ प्रलय नहीं है । तभी तो साहिब ने ऐसे लोक की बात कही है, जो अमर है, सत्य है, तीन लोक से परे है, सप्त आकाश से भी परे है । वहाँ कभी प्रलय नहीं है । यदि आत्मा अमर है तो निश्चय ही वो अमर देश ही आत्मा का सही ठिकाना है । चल हंसा तू देश हमारे, साहिब देत पुकारा है ।

सत्य तो केवल अमर लोक है, झूठा सब संसारा है।।

साहिब पुकार-पुकार कर कह गये हैं कि हे बंदे, इस झूठी दुनिया से ऊपर उठ और अपने देश चल। यह देश आत्मा का नहीं है । साहिब की वाणी बार-बार चेता रही है।

चलना तो है दूर मुसाफिर काहे सोवे रे ॥

यह आत्मा बड़ी दूर से आई है । यह देश इसका नहीं है। यदि यह परमात्मा का देश होता तो साहिब की वाणियाँ यह क्योंकर कहतीं ! चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो ।

यहि संसार काल है राजा, कर्म का जाल पसारा हो ॥

चौदह खंड बसे वाके मुख में, सबही को करत अहारा हो ।

बारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो ॥

ब्रह्मा विष्णु शिवतन धरिया, और को कौन विचारा हो ।

सुन नर मुनि सब छलछल मारले, चौरासी में डारा हो ॥

मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो ।

ताको रूप कहाँ लग बरनो, अनंत भानु उजियारा हो ॥

श्वेत स्वरूप शब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो ।

कोटिन चाँद सूर्य छिपि जैहैं, एक रोम उजियारा हो ॥

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