करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुनिया से छूटना चाह रहे हैं. पर झंझट यह है कि हमें यह ज्ञान नहीं है कि पूरा तीन लोक काल की सीमा के अन्दर है । हम मृत्यु लोक से छूटकर या स्वर्ग लोक जाना चाहते हैं या ब्रह्म लोक या पार- ब्रह्म लोक। इससे परे की दुनिया का हमें ज्ञान ही नहीं है । हमें आत्मा के सही ठिकाने का पता नहीं है । जाने- अनजाने में हम सभी उस साहिब की तलाश में हैं, पर ठीक से इस रहस्य को समझ न सकने के कारण हमने काल पुरुष को ही अपना परमात्मा मान लिया है। दुख और कष्ट देने वाले को ही अपना परम मित्र समझ लिया है। तभी तो साहिब कह रहे हैं—
जो रक्षक तहँ चीह्नत नाहीं । जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं । ।
काल- पुरुष का यह तीन लोक पाँच तत्वों से बना है । पाँचों तत्वों की एक सीमा है। शास्त्रों का भी मानना है कि महाप्रलय में ये पाँचों तत्व नष्ट हो जायेंगे। दयानन्द सरस्वती जी के सत्यार्थ प्रकाश में भी इसका उल्लेख मिलता है और वैज्ञानिक लोग भी इस सच्चाई को समझ रहे हैं । क्या यह तीन लोक, जिसमें स्वर्ग लोक, पितर लोक, ब्रह्म लोक आदि आते हैं, नष्ट हो जायेगा ? हाँ, यह सब समाप्त हो जायेगा, इसलिए यह विश्वास के योग्य नहीं है। संत-महापुरुषों ने तभी तो संसार को झूठा, अनित्य, स्वप्नवत् आदि कहा है। इसमें कुछ भी सच नहीं है, क्योंकि सब नाशवान् है । इस अनन्त को संतों ने तीन भागों में बाँटा है - शून्य, महाशून्य और अमर लोक। शून्य और महाशून्य दोनों नाशवान् हैं, पर शून्य वो स्थान है, जहाँ पर ग्रह, उपग्रह आदि हैं, जबकि महाशून्य में निर्गुण सृष्टि है । वहाँ आर्टिकल्स नहीं हैं । यानी जहाँ तक सूर्य, चाँद, तारे, ग्रह, उपग्रह आदि हैं, वो शून्य स्थान कहलाता है । शून्य की सीमा यहाँ तक है। इसके ऊपर फिर महाशून्य है । महाशून्य में ये सब नहीं है। निर्गुण स्थान है । महाशून्य में सात आकाश हैं। इन सात आकाशों को संतों ने सात सुरति कहा है । ये आकाश बड़े विराट् हैं । इनके अन्दर बड़े चुंबकीय आकर्षण हैं। इनमें एक अलोकिक आनन्द है । ये इतने विराट् हैं कि शून्य जैसी करोड़ों सृष्टियाँ एक-एक में समाती जायेंगी । सर्वप्रथम शून्य से पाँच असंख्य योजन ऊपर जाने पर चिंत लोक आता है। अचिंत लोक से फिर तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर सोहंग लोक आता है। सोहंग लोक से पुनः पाँच असंख्य योजन ऊपर