करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु और सतगुरु में अन्तर
गुरु और सद्गुरु में अन्तर क्या है ? अगर हम सद्गुरु शब्द पर चिंतन करते हैं तो साहिब से पहले यह शब्द नहीं मिलता है । यह शब्द पहले प्रचलित नहीं था। गुरु शब्द था। तो क्या गुरु शब्द का विरोध कर रहे हैं ? नहीं! पर पहले जो गुरु लोग थे, वो तीन - लोक की बात कर रहे थे । बहुत बड़ा अन्तर है। पहला अन्तर यह कि सगुण और निर्गुण भक्तियों में गुरु कहा गया। संतत्व की धारा में सद्गुरु कहा। सगुण और निर्गुण में भी गुरु का महत्व है। पर वो केवल दिशा देता है कि किस तरह परम-तत्व की प्राप्ति करनी है, किस तरह साधना करनी है। पर गुरु ने पार करने की जिम्मेवारी नहीं ली है। संसार सागर से पार होने के लिए आपको अपना प्रयास करना है, अपनी चेष्टा करनी है। यानी यह केवल मार्गदर्शक हुआ। कालांतर में जितने भी गुरु-शिष्य हुए, उनमें संवाद भी हुए, युद्ध भी हुए, पर संतत्व की धारा कह रही है-
गुरु का वचन मान सब लीजे । सत्य असत्य विचार न कीजे ॥
विचार भी नहीं करना है । सद्गुरु की इतनी महिमा के पीछे कुछ कारण है। सद्गुरु आपको साधन करने के लिए नहीं बोलता है। वो आपको संसार-सागर से पार कर देता है । दोनों के काम में अन्तर हुआ कि नहीं ! साहिब नहीं कह रहे हैं कि आप कमाई करो, साधना करो । वो सीधा कह रहे हैं कि सद्गुरु आपको पार कर देगा ।
तीन लोक नव खण्ड में, गुरु से बड़ा न कोय ।
कर्त्ता करे न कर सके, गुरु करे सो होय ॥
सतगुरु दीन दयाल जी, तुम लग मेरी दौड़ ।
जैसे काग जहाज पर, सूझत और न ठौर ॥
क्या अन्तर है ? बहुत बड़ा तत्वविज्ञान है; तार्किक अन्तर है । सद्गुरु स्वयं ही आपको चेतन कर देगा। वो आपके अन्दर ईश्वरीय सत्ता प्रकट कर