करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंअक्षर की सीमा में होने से काल का नाम हुआ। वो अनाम है, वो नि: अक्षर है, उसे कोई नहीं जानता है । हे धर्मदास ! वहीं मेरा वास है; वहाँ काल भी नहीं पहुँच
सकता है । उसकी जो कोई भक्ति करता है, उसका फिर कभी जन्म नहीं होता । ।
पर अब यहाँ एक बात और हो गयी। सगुण या निर्गुण भक्त भी अपने को सद्गुरु समझने लग गये हैं । वे साहिब की मोहर लगाकर सांसारिक नाम का व्यापार करने लगे हैं । वे साहिब की वाणी तो ले रहे हैं, पर स्वयं तीन- लोक में ही अटके हुए हैं। लेकिन संतों ने तो इस तीन- लोक से परे एक चौथे अमर-लोक की बात की है। उन्होंने मनुष्य को समझाने का प्रयास किया है कि हे मनुष्य ! यह संसार काल का देश है, इससे ऊपर उठ और अपने देश में चल । वहाँ से फिर कभी भी इस नरक - कुण्ड में नहीं लौटना है । अमर - लोक में जाना ही सच्चे मोक्ष की प्राप्ति है । जो जीव सच्चे सद्गुरु की शरण में आ जाते हैं, वे ही सच्चे मोक्ष के अधिकारी बन पाते हैं जबकि अधिकतर सगुण- निर्गुण में ही उलझकर अपना अमोलक मानव-चोला झूठी मुक्तियों की बलि चढ़ा देते हैं। सतगुरु शरण न आवहीं, फिर फिर होय अकाज ।
जीव खोय सब जायेंगे, तिहुँ पर काल का राज ।।
कमाई से परे सद्गुरु कृपा की बात कर रहे हैं
बहु बंधन ते बांधिया, एक विचारा जीव ।
जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥
कह रहे हैं कि जीव खुद अपनी ताक़त से नहीं छूट सकता है। क्योंकि बाँधने वाली ताक़त शक्तिशाली है । आप पढ़ते हैं कि शृंगी ऋषि की तपस्या भंग कर दी गयी। क्रोध ने भृगु ऋषि का तप भंग कर दिया।
क्रोध किये गति मुक्ति न होय ॥
यानी अन्दर में विवश करने वाले शत्रुओं ने तप भंग कर दिया। ये आए कहाँ से? कितनी सहज वाणी है कि जिन शक्तियों ने जकड़ा है, उनसे अपनी ताक़त से नहीं छूट सकता है।
जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव ॥
यह अपनी ताक़त से नहीं छूटने वाला है। कुछ को बुरा लगा। वो कह