करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहैं कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहो परकाशा ।।
आदि न अंत हती न माया । उत्पति प्रलय हती न काया।।
आदि ब्रह्म नहीं ओंकारा। नहीं निरंजन नहिं अवतारा ।।
दश अवतार न चौवीस रूपा । तब नहिं होता ज्योति स्वरूपा ।।
नहिं तब शून्य सुमेर न भारा । कूर्म न शेष धरे अवतारा ।।
अक्षर एक न ररंकारा । त्रिगुण रूप है नहिं विस्तारा ।।
शक्ति युक्ति न आदि भवानी । एक होय नहिं ज्ञान अज्ञानी ।।
नहीं है बीज नहीं ओंकारा । आदि अमी नहीं चंद न सूरा ।।
कहा कि मैं अपना भेद सुनाता हूँ, समझना । मैं तबसे हूँ जब आदि अंत कुछ भी नहीं था, माया नहीं थी । उत्पति नहीं थी, प्रलय नहीं थी, काया नहीं थी, ओंकार नहीं था, निरंजन नहीं था, उसके दस अवतार नहीं थे, आदि भवानी नहीं थीं, सूर्य-चाँद नहीं थे। परम-पुरुष का भेद देते हुए साहिब आगे धर्मदास को समझाते हैं-
पुरुष कहो तो पुरुषहि नाहीं । पुरुष हुवा आपा भू माहीं ।।
शब्द कहो तो शब्दहि नाहीं । शब्द होय माया के छाहीं ॥।
दो बिन होय न अधर अवाजा। कहो कहा यह काज अकाजा ।।
अमृत सागर वार न पारा । नहिं जानों केतिक विस्तारा ।।
तामें अधर भवन इक जागा । अक्षय नाम अक्षर इक लागा ।।
नाम कहो तो नाम न जाका। नाम धरा जो काल तिहि ताका ।।
है अनाम अक्षर के माहीं । निह अक्षर कोई जानत नाहीं ।।
धर्मदास तहँ बास हमारा। काल अकाल न पावे पारा।।
ताकी भक्ति करै जो कोई । भव ते छूटै जन्म न होई ।।
कहा कि यदि उस सत्ता को पुरुष कहा जाए तो वो पुरुष नहीं है, क्योंकि पुरुष तो स्वयं प्रकृति से हुआ है । फिर यदि उसे शब्द कहा जाए तो वो शब्द भी नहीं है, क्योंकि शब्द भी माया से ही उत्पन्न होता है । दो चीजें आपस में टकराती हैं, तभी शब्द उत्पन्न होता है | आवाज़ दो के बिना नहीं होती, इसलिए जहाँ द्वैत आ गया, वहाँ माया है । पर उस अमृत- सागर का कोई पार नहीं है । वो एक अक्षय लोक है, अक्षय नाम है, कभी मिटता नहीं है । पर यदि उसका कोई नाम कहा जाए तो उसका कोई नाम भी नहीं है, क्योंकि नाम