भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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तक निर्गुण-भक्ति करते हैं, पर आप इन दोनों के पार बता रहे हैं; मुझे समझ नहीं आ रहा है कि वहाँ कैसे ध्यान लगाऊँ, कैसे वहाँ की भक्ति करूँ। मुझे सगुण और निर्गुण का भेद बताकर तीसरी न्यारी भक्ति बताओ। मैं जानता हूँ कि आप सत्य हैं और आपकी सब बातें भी सत्य ही हैं । फिर साहिब ने कहा-

सुन धर्मन समरथ है न्यारा । ताको नहीं जाने संसारा ।।

योगेश्वर वह गति नहिं पाई। सिद्ध साधक की कौन चलाई ||

भक्ति होय जगत में भारी । ध्रुव प्रह्लाद सदा अधिकारी ।।

सतयुग भक्ति करी ध्रुव राजा । पाँच वर्ष आयू तत भ्राजा ।।

निकसे गृह ते बाहर गयेऊ। नारद के उपदेशी भयेऊ ।।

छठें मास प्रकटे हरि आई। राज दिये वैकुण्ठ पठाई ।।

साठ हजार वर्ष दियो राजू । कुटुम सहित वैकुण्ठ विराजू ।।

एक दिवस जब प्रलय आई । तहाँ ते पुनि ये देह गिराई ।।

ऐसे भक्त भये जग माहीं । परम पुरुष गत पावत नाहीं ।।

कहा कि जो परम - पुरुष है, वो सबसे न्यारा है, उसे कोई नहीं जानता । योगेश्वर भी वो गति नहीं पा सकते, फिर सिद्ध, साधक आदि किस गिनती में हैं! संसार में भक्ति करने वाले बहुत हुए, पर परम - पुरुष का भेद किसी ने नहीं पाया, इसलिए संसार के आवागमन का चक्कर नहीं छूटा । धर्मदास जी ने पूछा— धर्मदास बूझे चित लाई | सतगुरु संशय देहु मिटाई || सर्गुण भक्त मुक्त नहिं होई । है वह एकहि या है दोई ||

की सर्गुण को निर्गुण कहिये । भिन्न भिन्न भेद मोहिं कहिये ।।

यह संसार कहाँ से आया । को है ब्रह्म अरु को है माया ।।

भक्ति भेद कहो मोहे स्वामी । तुम सब घट के अंतर्यामी ।।

जीव काज आये जगमाहीं । अब मोको कछु संशय नाहीं ।।

कहा कि क्या सगुण-भक्त मुक्त नहीं होता ! वो सगुण कोई दूसरा है या वही एक परमात्मा है। कृपया मुझे सगुण-निर्गुण का भेद अलग-अलग करके बताओ। यह संसार कहाँ से आया है, ब्रह्म कौन है और माया क्या है ! मुझे भक्ति का सारा भेद समझाकर कहो, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप जीवों का कल्याण करने के लिए ही संसार में आए हैं । तो साहिब ने आगे कहा-