भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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ताकी भक्ति से उतरे पारा। फिर के नहिं ले जग अवतारा ।।

भक्ति ही भक्ति भेद बहु भारी । यही भक्ति जगत ते न्यारी ।।

हे धर्मदास ! तुम बुद्धिमान हो, इसलिए संतों के संग में जाकर सत्य भक्ति को प्राप्त करो। एक पुरुष अगम है; उसको संसार नहीं जानता है । उसकी भक्ति से ही जीव संसार-सागर से पार होकर फिर वापिस नहीं आता । यही सच्ची भक्ति का गुप्त भेद है, जो संसार की सभी भक्तियों से न्यारी है । धर्मदास जी ने पूछा-

धर्मदास कहै सुनो गुसाईं । पूरण पुरुष बसै किहि ठाई ।।

केहि विधि सों सेवा कीजे । कैसे चरण कमल चित दीजे || पूछा कि वो परम पुरुष कहाँ रहता है; कैसे उसकी भक्ति करूँ ? साहिब ने कहा—

पहिले प्रेम अंग मैं आवे । साधु देख सम्मुख होय धावे ।।

चरण धोय चरणामृत लेवे । प्रीति सहित साधु को सेवे ।।

जोई साधु प्रेम गति जाने । ता साधु की सेवा ठाने ।।

परम पुरुष की भक्ति दृढ़ावे । सुरतै नृप कर तहँ पहुँचावे ।।

तासों भक्ति करो चितलाई । छाड़ो दुर्मति औ चतुराई ||

तबही परम पुरुष को पाये । भव तरके जग बहुरि न आवे ।।

कहा कि पहले अंतर में साधु के प्रति प्रेम उत्पन्न करे, उनके चरण धोकर चरणामृत ले, उनकी सेवा करे । जो साधु सच्चे प्रेम की बात जानता हो, उसकी सेवा करो। वो ही परम-पुरुष की भक्ति में लगाकर वहाँ पहुँचा सकता है । उसी की भक्ति करो, तब ही परम-पुरुष को पाकर संसार से पार हो सकते हो। आगे धर्मदास जी ने पूछा-

सगुण भक्ति करे संसारा । निर्गुण योगेश्वर आधारा ।।

इन दोनों के पार बतावा । तुम कैसी विधि तहँ मन लावा ।।

सत्य बात मोहि कहो गुसाईं । केहि विधि सुरति लगाऊँ धाई ||

सतगुरु संशय देहु निवारी । मैं जाऊँ तुम्हरी बलिहारी ।।

सगुण निर्गुण भेद बताऊँ । तीसर न्यार मोहिं लखाऊँ ।।

तुम सत सत्य तुम्हारी बाता। मैं याचक तुम समरथ दाता ।।

कहा, हे साहिब! आम संसारी जीव सगुण भक्ति करता है, योगेश्वर