करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंविषयों में फँसे हुए हैं; विषय भोगकर फिर विषयों में ही आकर समाते हैं । इससे कोई नहीं बच पाया । जो मेरी भक्ति पाकर उसकी युक्ति जानता है, उसका आवागमण मिट जाता है; फिर वो मातृ गर्भ में नहीं आता।
जो तुम पूछो भक्ति प्रकारा । ताका भेद सुनो अब न्यारा।।
भक्ति होय न नाचे गाये । भक्ति होय न घंट बजाये ।।
भक्ति होय न मूरत पूजा । पाहन सेवे क्या तोहि सूझा ।।
विमल विमल गावें अरु रोवें । क्षण एक परम जन्म को खोवें ।।
ऐसे साहब मानत नाहीं । ये सब काल रूप के छाहीं ।।
मन ही गावे मन ही रोवे । मन ही जागे मन ही सोवे ।।
जब लग भीतर लग्न न लागे । तब लग सुरति कबहुँ न जागे ।।
सत्य नाम की खबर न पाई । का कर भक्ति करों रे भाई ||
ठौर ठिकाना जानत नाहीं । झूठे मग्न रहैं मन माहीं।।
कहन सुनन को भक्त कहावें । भक्ति भेद कितहूँ नहिं पावें ।।
अपने साहिब को न जाना । बिन देखे का किया बखाना ।।
ऐसे भूल परे संसारा । कैसे उतरे भव जल पारा ।।
धर्मदास ! जो तुम सच्ची भक्ति पूछ रहे हो तो पहले यह समझ लो कि नाचना, गाना, घंट बजाना, मूर्ति पूजा आदि यह सब भक्ति में नहीं आते। फिर रोना, गाना आदि भी भक्ति नहीं है । इन चीजों से साहिब खुश नहीं होते हैं। ये सब तो काल का जाल है, क्योंकि मन ही रोता है, मन ही गाता है, मन ही जागता है, मन ही सोता है । इसलिए जब तक भीतर लग्न नहीं लगती, तब तक इन बाहरी चीज़ों से सुरति चेतन नहीं हो सकती। जब तक सत्यनाम नहीं मिल जाता, तब तक कौन-सी भक्ति हुई ! सच्चे साहिब के घर का तो पता नहीं है, फिर झूठे ही मन में खुश होते रहने से क्या होता है ! ऐसे तो कहने- सुनने को बहुत सारे भक्त बन जाते हैं, पर सच्ची भक्ति का भेद मालूम नहीं होता। बिना देखे ही उसका बखान करते रहने से कुछ नहीं होता। सारा संसार ऐसे ही बाहरी चीजों में उलझा हुआ है, फिर संसार सागर से पार कैसे पाया जा सकता है !
धर्मदास तुम हो बुद्धिवंता । भक्ति करो पावो सतसंता।।
एक पुरुष है अगम अपारा। ताको नहीं जाने संसारा।